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Anilkumar Rathwa (Sameer)

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धीरज रख, क्योंकि हर बड़ा बदलाव पहले इंसान को तोड़ता है। सपनों तक पहुँचने से पहले हर रास्ता खुद से लड़ना सिखाता है। यह सफर तालियों के � read more >>
ज़िंदगी तब तक हल्की सी लगती है, जब तक हर बोझ माँ-बाप उठाते हैं। हम धूप में भी सुकून ढूँढ लेते हैं, क्योंकि वो अपने हिस्से की छाँव गंवाते read more >>
किस्मत कोई ताज नहीं जो बैठे-बैठे मिल जाए, ये तो वो जंग है जो सिर्फ़ लड़ने से ही जीती जाए। ख़यालों की उड़ान बहुतों ने भरी है, पर मंज़िल उस read more >>
कितनी भी योजनाएँ बना लो तुम, नक़्शे, रास्ते, मंज़िल के सपने— आख़िरी मोहर समय ही लगाता है, बाक़ी सब तो इंसान के अपने-अपने भ्रम हैं। हम स� read more >>
परिवर्तन प्रकृति का अटल नियम है, यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं—न लोग, न हालात। जो पीछे छूट गया, वो कहानी बन चुका, अब उसकी राख कुरेदना खुद को जल read more >>
जीवन से बड़ा कोई विद्यालय नहीं, ये सिखाता दर्द भी, हिम्मत भी, ताल भी। हर सुबह नई लड़ाई, हर रात नया सबक, जो भागेगा इससे—वो रह जाएगा फँसकर। read more >>
अनुमान तो बस दिमाग की एक चाल है, आज सही—कल पूरी तरह बेहाल है। पर अनुभव… वो आग है, जिसमें जलकर इंसान स्टील बनता है। अनुमान बहकाता है, क� read more >>
हमेशा सोच जीत की रखो, हर मंज़िल का दरवाज़ा खुलता है; जो रातों में जलता रहता है, सुबह वही सूरज बनकर मिलता है। कदमों में दम, दिल में ज़ोर, read more >>
त्याग तो करना होगा, नींद का या फिर सपनों का— जो आराम से समझौता कर बैठा, वो मंज़िल से हाथ धो बैठा। यह दुनिया तकिए नहीं देती, यहाँ बिस्तर read more >>
धूल चाहे जितनी भी ऊँची उड़ ले, कोई आसमान को गंदा नहीं कर पाती; इंसान भी हालातों से कितना ही टूटे, सच्ची नीयत उसको फिर से खड़ा बनाती। ज़� read more >>
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