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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
संदीप कुमार सिंह
संदीप कुमार सिंह
@ sandeep-kumar-singh
, Bihar
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me.
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दुनियाँ का दस्तुर-जीवन है संघर्ष
दुनियाँ का दस्तूर है, जीवन है संघर्ष। पाते मीठा स्वाद को, सत्य अटल निष्कर्ष।। दुनियाँ का दस्तूर है,चलूं सदा सच राह। पुष्ट विजय तब है �
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समाधान हर बात का- निराश नहीं होता
समाधान हर बात का,होता नहीं निराश। सुख दुख तो आते रहे, मन में दिव्य प्रकाश।। समाधान हर बात का,बनूं नहीं मैं दुष्ट। रखूं सदा मैं मित्रत�
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विधि का लिखा विधान-सफल करूं हर काम
विधि का लिखा विधान है, समझ इसे तूं ईश। कर्म राह चलता रहूं, कृपा करे जगदीश।। विधि का लिखा विधान है, होना नहीं हताश। नेक इरादे रख सदा, खुश�
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जलने लगे अलाव-ठंढ़ी चारों ओर
जलने लगे अलाव अब,ठंढ़ी चारों ओर। थड़थड़ हैं तन कांपते, बंधे नहीं है कौर।। जलने लगे अलाव अब,अमृत तुल्य है आग। बिना आग के जल नहीं,गाते सब
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सुख दुख हैं मेहमान-स्वागत करना काम
सुख दुख हैं मेहमान जी,स्वागत करना काम। दो ही पहलू सत्य है,कभी सुबह तो शाम।। सुख दुख हैं मेहमान जी, सही सिखाते मर्म। सुख में भी प्रभु मै
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भारत एक बड़ा बाजार है
उदारीकरण भूमंडलीकरण का आर्थिक तत्व है। यह एक प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत एक अत्यंत नियंत्रित अर्थव्यवस्था खुली दिखने वाली व्यवस्था
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इच्छाएं बेअंत है
इच्छाएं बेअंत है,काबू में रख यार। बेहिसाब रख प्यार को, सुख मय हो परिवार।। इच्छाएं बेअंत है, परम् जरूरी आप। मैं चाहूं जग का भला, करूं मं
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जलने लगे अलाव अब
जलने लगे अलाव अब,ठंढ़ी चारों ओर। थड़थड़ हैं तन कांपते, बंधे नहीं है कौर।। जलने लगे अलाव अब,अमृत तुल्य है आग। बिना आग के जल नहीं,गाते सब
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सुख दिख हैं मेहमान जी
सुख दुख हैं मेहमान जी,स्वागत करना काम। दो ही पहलू सत्य है,कभी सुबह तो शाम।। सुख दुख हैं मेहमान जी, सही सिखाते मर्म। सुख में भी प्रभु मै
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स्पर्धा का दौर है
स्पर्धा का दौर है,मन को रखें बुलंद। रखिए ऊँच विचार को, हों शीतल सम चंद।। स्पर्धा का दौर है, रखें साथ उत्साह। कम हों कभी न चाह नव,लगे सु�
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