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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
@ sandeep-kumar-singh
, Bihar
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me.
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हमारा संविधान मानवता का पोषक है
हमारा संविधान मानवता का पोषक है। वह किसी भी संप्रदाय या व्यक्ति को समाप्त करने की धमकी नहीं देता, ना ही ऐसा करने के लिए किसी एक व्यक्ति
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नारी सम्मान
नारी समाज का एक अभिन्न अंग है। नारी एक वह पहलू है जिसके बिना किसी समाज की रचना संभव नहीं है। समाज में नारी एक उत्पादक की भूमिका निभाती �
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गुरुवर तेरे चरणों की
गुरुवर तेरे चरणों की, मुझे धूल जो मिल जाये, चरणों की रज पाकर,तकदीर बदल जाये।..गुरूवर... मेरा मन बडा चंचल है उसे कैसे मैं समझाऊँ, उसे ज�
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जिन्दगी जीने में मज़ा है
जिन्दगी है दोस्तों, इनके कई रूप हैं कई रंग हैं। फिर भी हम मानवों को, संघर्ष पथ पर निरंतर, बखूबी चलते ही रहना है। गम भी मिलेंगे, जख्म भी �
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लोगों के एक हिस्से के अधिकारों के संघर्ष
लोगों के एक हिस्से के अधिकारों के संघर्ष को लोगों के किसी दूसरे हिस्से के हित के खिलाफ दिखलाने की शासकों की कोशिशों को हमें चुनौती दे�
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मैं पथ का दीया
मोहब्बत की दुनिया, जिस पथ पे तुम चले, उस पथ पे मुझे आँचल तो, बिछाने दे। साथी न समझ कोई बात नहीं, मुझे साथ तो आने दे। थक ज�
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तमन्ना जवां
मूँह छुपा कर गया है अँधेरा, मेरे दिल ने जो माँगा मिल गया, मैंने जो कुछ भी चाहा मिल गया। हो गई प्यार की हर तमन्ना- तमन्न
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फूलों में होगा मेरा आशियाँ
मूँह छुपा कर गया है अँधेरा, मेरे दिल ने जो माँगा मिल गया, मैंने जो कुछ भी चाहा मिल गया। हो गई प्यार की हर तमन्ना- तमन्न
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विकास
सर्व मंगल मांगल्ए आदिपुराण, कुंठित निकृष्ट परेशान। मानसिकता विचलित होती, संगम विचारों में नव जावक नौजवान। जब आदिमानव रह�
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रूप भवन
सुनयन सुकाकुल नगर रूप भवन, चारों और व्याप्त सनसनाती खामोशी। वन-वनिकाएं वृंद वृंदनाएं वृंदावन, साबरमती के झूले फूल उपवन।
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