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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
@ sandeep-kumar-singh
, Bihar
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me.
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सभी शोहरत पास हो-रहे मजबूत हाथ
(दोहा छंद) सभी शोहरत पास हो,रहे मजबूत हाथ। पता नहीं किस मोड़ पर,किस्मत दे दे साथ।। पता नहीं किस मोड़ पर,पूर्ण सभी हो खोज। मन में सुरभित
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पता नहीं किस मोड़ पर-मिल जाए भगवान
(दोहा छंद) पता नहीं किस मोड़ पर,मिल जाए भगवान। सभी मनोरथ पूर्ण हों,देंगे शुभ वरदान।। पता नहीं किस मोड़ पर, हो जाए उद्धार। इसी आस में मै
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मिला फरेबी जन यहां-कुचले सबकी आस
(दोहा छंद) मिला फरेबी जन यहां,कुचले सबकी आस। झुलस रहा है आदमी,मिले न अब विश्वास।। झुलस रहा है आदमी,करे खुशी सरकार। लोगों में है वेदना,�
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जला दिया अरमान को-भूल गई अनुराग
(दोहा छंद) जला दिया अरमान को,भूल गई अनुराग। झुलस रहा है आदमी,महँगाई की आग।। जला झुलस रहा है आदमी,मिले न अब विश्वास। मिले फरेबी जन यहां,�
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झुलस रहा है आदमी- छलियों का है राज
(दोहा छंद) झुलस रहा है आदमी, छलियों का है राज। वादा झटपट तोड़ते, समझे खुद को बाज।। झुलस रहा है आदमी,मिलता है प्रतिघात। मन जाता है टूट तब
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मचल रही है वादियाँ-दामन में रख लाज
(दोहा छंद) मचल रही है वादि, दामन में रख लाज। कल किसने देखा यहां, जी लें खिल कर आज।। कल किसने देखा यहां,वर्तमान पर नाज। हंसते गाते रह यहा�
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अपना भाव उतार दे-लगे निशाने बाण
(दोहा छंद) अपना भाव उतार दे,लगे निशाने बाण। किसने रोका है तुम्हें, करने को निर्माण।। किसने रोका है तुम्हें,खूब लीजिए श्वास। धड़कन को �
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किसने रोका है तुम्हें-करने को निर्माण
(दोहा छंद) जागृत करें समाज को, करें खत्म अभिशाप। किसने रोका है तुम्हें,रचना रचिए आप।। किसने रोका है तुम्हें,करने को निर्माण। अपना भा�
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किसने रोका है तुम्हें-अपनी दशा सुधार
(दोहा छंद) किसने रोका है तुम्हें, अपनी दशा सुधार। मन में यह अब ठान ले,लेंगे सब अधिकार।। किसने रोका है तुम्हें, जीवन से कर प्यार। ताकि र�
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गर्मी आई खूब है-खूब लगे अब प्यास पानी मधु जैसा लगे सुख
(दोहा छंद) गर्मी आई खूब है,खूब लगे अब प्यास। पानी मधु जैसा लगे,सुख मय हो अहसास।। कभी हवा यूं जब मिले,लगती है नव जान। जैसे दुर्लभ चीज हो,�
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