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कविताएँ
अधरों की मुसकान पर-दिल होता कुर्बान
(दोहा छंद) अधरों की मुस्कान पर, दिल होता कुर्बान। उसको अपना जान कर, बना लिया हूं जान।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्ती�
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पग पग पर बाधा मिले- फिर भी बन इन्सान
(दोहा छंद) जीवन जीना है कला, राह नहीं आसान। पग पग पर बाधा मिले, फिर भी बन इन्सान।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्तीपुर(दे
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रात दिवस बीते सदा-मिलते सिर्फ निशान
(दोहा छंद) मंजिल मिले तलाश से,राह नहीं आसान। रात दिवस बीते सदा, मिलते सिर्फ निशान।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्तीपु�
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मानव उत्तम योनियां-जिसमें भरे निदान
(दोहा छंद) जन्म मरण के खेल का, राह नहीं आसान। मानव उत्तम योनियां,जिसमें भरे निदान ।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्तीप�
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जीवन में कष्ट नित-राह नहीं आसान
(दोहा छंद) जीवन में हैं कष्ट नित, राह नहीं आसान। सुख दुख को है झेलना, तब मिलते हैं मान।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्ती
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प्राण संघर्ष पूर्ण है-राह नहीं आसान
(दोहा छंद) प्राण संघर्ष पूर्ण है, राह नहीं आसान। फिर भी बुलन्द हौसला, से मिलती पहचान।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्त�
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बीते दिन वनवास के-बहुत उठाए कष्ट
(मुक्तक छंद) बीते दिन वनवास के, बहुत उठाए कष्ट। खुशी मिली तब राम को , दुष्टों का कर नष्ट। धर्म ध्वज का जय हुआ, खुशी अयोध्या धाम_ प्रजा उत्
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कोई बसन्त भाता नहीं है-हंसने हंसाने को सब कुछ यहां है
तुमसे दूर हो कुछ भाता नहीं है। झिलमिल दिए बुझने लगे हैं मन में दीया जगमगाता नहीं है। कैसे मधुप ने नई राह चुन ली मुझमें धैर्य अब समाता �
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झिलमिल दिए बुझने लगे हैं- मन में दीया जगमगाता नहीं है
तुमसे दूर हो कुछ भाता नहीं है। झिलमिल दिए बुझने लगे हैं मन में दीया जगमगाता नहीं है। कैसे मधुप ने नई राह चुन ली मुझमें धैर्य अब समाता �
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हे वेदों के अकाल पुरुष तुम कौन हो
कविता- हे वेदों के अकाल पुरुष!तुम कौन हो? पद- श्रीहरि भक्ति पद। रस- भक्ति रस छन्द- मुक्तक (मुक्त छन्द) कविता- (१) तुम कैलाशी! तुम अविनाशी!
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हार हृदय की वही कहानी-तुम ही तो कह जाते हो
हार हृदय की वही कहानी तुम ही तो कह जाते हो। साथ साथ मेरे आकर मुझको ही छल जाते हो। वही वेदना फिर उठ कर जीवन राग सुनाती है दिखा छलावा रूप
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तुम बस मुस्कुराना-हजारों दीप जल जाए
हजारों दीप जल जाए तुम बस मुस्कुराना। निगाहें मेरी थम जाए तुम बस मुस्कुराना। दर्द जब भी बढ़े कि सीना चीर जाए हौसला उससे मिलने का कभी
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