*छत्तीसगढ़ी प्रतीकात्मक बालगीत*
*1- ( अटकन )*
अर्थ-
जीर्ण शरीर हुआ जीव जब भोजन उचित रूप से निगल तक नहीँ पाता अटकने लगता है--
*2- ( बटकन )*
अर्थ-
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प्रेम सु जिंदगी, प्रेम मे राम !
प्रेम ही जिंदगी के सब सुखों का नाम!!
मिले सतगुरु इतना !
प्रेम में रहे उतना!!
ऐसा भाग मेरा, सतगुरु मिले राम!
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लगता है निराश हो गया है,
कुछ तो वजह होगी?
खैर छोड़ो कोई बात नहीं।
लगता है कुछ ज्यादा ही,
मगरुर हो, नहीं तो,
तुम्हें भी पत्ता होता,
अब क्या read more >>
काऊ कोऊ प्रियतमा से तौऊ बिन जिव नौऊ भय!
लागु मन ताऊ से जिव अब काऊ भय!!
मझताऊ थाऊ से मै तौउ न पेऊ!
आवु मै घिरी-घिरी जाऊ न पेऊ!!
अर्थ:-
कहने read more >>