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जब कहना था तो
जब कहना था तो कहा नहीं अब कहने को कुछ बचा नहीं मूक था मैं या बना दिया चुप रहना हमें सिखा दिया कहने का अवसर भी गंवा दिया बांध लिया तुमने �
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बूंद की व्यथा
टपक रही नल की बूंदे खुद को सोच रही क्या यही हमारी किस्मत है क्या यह बदलेगी नहीं क्या नहीं गिर सकती मैं किसी के शरीर पर क्या नहीं पड़ सक
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पेड़
जीने के लिए हवा खाने के लिए खाना, कौन ये सब देता है तुम यही बतलाना। गाय भैंस बकरी व घोड़े सब पेड़ खाकर जीते हैं, भूलना मत तुम सेहत हेतु इन�
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सांझ
जिंदगी कड़ी धूप तो छांव है ये सांझ। आकर चुपके से कानों में कुछ फुसफुसाती है ये सांझ। अपनों को साथ बैठाती है तो चाय संग पकौड़े भी खिलात�
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कोरोना या...
काम है न काज है, मिलता नही अनाज है, लॉकडाउन में रह के हमने देखा सबका राज है कुछ ने तो दीपक मोमबत्ती और टॉर्च जलवाया है किन्तु कुछ ने अवस
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विरह-प्रसंग(1-11 दोहे) सुनील कुमार नायक
(1)बैरण बादळी मत बरसै,म्हारौ पिवजी बसे परदेश। पिवजी बेगा आवजो,हिवङै मे करुं कलेश।। (2)सावण सुखो जाय पियाजी,कद आओ म्हारै देस। गौरी त�
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जब वो रूठ जाती है
जब वो रूठ जाती है घुटनों के बल जमी पर बैठकर तिरछी नजर से देख जाती है जब वो रूठ जाती हैं चेहरे को अपने फुलाए हुए नयनों को अपने जमाये हु
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छोटे छोटे क़दमों से
छोटे-छोटे कदमों से हम चले जाएंगे, मंजिल दूर हो चाहे कितनी भी हम पहुंच जाएंगे छोटे-छोटे कदमों से हम चले जाएंगे आएंगी बड़े मुश्किल हाल�
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काले मेघ
चुपचाप बैठ मैं देखता रहा, कभी पेड़ों की हिलती हुई पत्तियों को तो कभी उमड़ते हुए बादलों को न जाने कब यह बारिश कराएगी या यूं ही मेरे सामन�
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कल की कहानी
मेरे पुत्र कार्तिक बंसल को समर्पित मेरी यह रचना कविता = ( कल की कहानी ) तुझमें अपना बचपन देखा ! तुझमें अपनी जवानी !! तुझमें गुजरा कल है द�
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झूठी शान के खातिर.....
झूठी शान के खातिर देखो , लोग क्या से क्या कर जाते है । रावण को कहते है दोषी , क्या स्वयं राम बन पाते है । मरे हुए को हर बार जलाते , पर�
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जिंदगी लेती है परीक्षा -कटु सत्य
जिंदगी इंसान के जीवन में उससे कई बार परीक्षा लेती है ( सीख ) __ बस इंसान को उस परीक्षा में पास होने के लिए संयमी बनना पड़ेगा �
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