निर्भया के समाज से सवाल – पूनम शर्मा

निर्भया के समाज से सवाल – पूनम शर्मा

क्या 16 दिसम्बर 2012 की वह रात बाकी रातों से अलग थी? क्या मैंने रात को घर से बाहर निकल कर कोई गलती की थी? जो मुझे ऐसी सज़ा मिली। मेरा सपना था कि मैं अपने माता पिता का नाम रौशन करूं। वह मेरे नाम से पहचाने जाएं। पर इस तरह से उन्हें पहचान मिलें, एेसा तो नही सोचा था। क्या मेरा कसूर बस यही था कि लड़की होने के बावजूद मैं पढ़-लिख कर आगे बढ़ना चाहती थी? पर मेरा लड़की होना ही मेरे लिए अभिशाप बन गया। मुझे खिलौना समझ कर वासना का गंदा खेल खेला और फिर जब मन भर गया तो तोड़ मरोड़ कर सड़क पर फैंक दिया। उस ठिठुरती रात में जब आप सब अपने घरों में कम्बल ताने सो रहे थे। मैं अकेली निर्वस्त्र मरणावस्था में जिंदगी व मौत से जूझ रही थी। तब मेरे मन में बार बार यह सवाल उठ रहा था कि आखिर मेरा कसूर क्या था? मेरे साथ ऐसा करने वालों का दिल एक बार भी नहीं कांपा होगा?क्या उनके घर में कोई लड़की नही होगी? मेरे साथ एेसा करने के बाद वह अपनी मां, बहन, पत्नी या बेटी से नज़र मिला पाएें होंगें? मेरे शारीरिक घाव मुझे मार रहे थे पर मैं जीना चाहती थी, अपने लिए, अपने माता पिता के लिए, अपने सपनों के लिए। सुबह हुई देश जागा, और मैं सुर्खियों मे आ गई हर न्यूज़ चैनल की। कुछ लोगों ने मेरा दर्द महसूस किया तो कुछ लोग एेसे भी थे जिन्होंने कहा लड़की होकर इतनी रात में बाहर क्या करने गई थी? लड़की ही गलत होगी। अपने आप को बचाने के लिए लड़ना, गलत हरकतों का विरोध करना गलत है तो हां मैं थी गलत लड़की। लोग नारें लगाने लगे, मोमबतियां जलाने लगे, कानून को कोसने लगे, मुझे नए नाम दिए जाने लगे। एेसे शोर मचाने लगे जैसे ये पहली बार हुआ है। पहले भी ऐसा कितनी बार हुआ है और मेरे बाद भी हो रहा है। फिर ये हल्ला क्यों? लोग सरकारों पर आरोप लगाने लगे। राजनीति की रोटियां सेकनें के लिए इससे अच्छा अवसर और क्या हो सकता था। पर क्या सच में ऐसी घटनाओं के लिए दोषी सरकार व कानून ही होते हैं? क्या हमारा कोई फर्ज़ नहीं है कि हम कुछ करें? क्या हमें अपनी मानसिकता में बदलाव नहीं लाना चाहिए? लड़की का रात को घर से बाहर निकलना ही क्यों गलत होता है, ऐसे पिशाचों का क्यों नहीं? क्या मां बाप लड़कों से पूछते हैं कि रात को बाहर क्या करने जा रहे हो? क्या बचपन से ही लड़कों को औरतों का सम्मान करना नहीं सिखाना चाहिए? क्या जब तक हम नहीं सुधरते ये सारे कानून बेकार नही है? मेरे साथ तो यह कुकर्म सुनसान रात में अजनबी लोगों ने किया पर न जाने कितनी एेसी घटनाऐं हैं जो उनके अपने घरों में अपने लोगों से की जाती है। पर हम चुप रहते हैं, कभी बदनामी के डर से तो कभी घर टूटने के डर से। क्या हमारा डर ही इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार नहीं है? समाज में हम और आप रहते हैं, ऐसी घटनाएं भी हमारे और आपके साथ होती है, तो इन्हें रोकने का काम भी हमारा और आपका नहीं है? मैं तो इस दुनिया से चली गई पर छोड़ गई हूं लाखों सवाल। अगर समय मिलें तो एक बार उनके जवाब सोचना जरूर। शायद इन सवालों के जवाब ही एेसी घटनाऐं रोक पाएं।

पूनम शर्मा
नई दिल्ली

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