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“रंगभेद भाव”-अंजू तंवर

Apartheid” शब्द अंग्रेजी शब्द है जितना कठिन उच्चारण है उससे काफी गुना हिंदी अर्थ समझ से परे है।
“रंगभेद भाव” यही अर्थ निकलता है हिन्दी में शब्द भले ही आरामदायक और आसान हो, पर इसके बहुत संघर्ष की कहानियां जुड़ी है,

क्या है रंगभेद भाव नीति

जैसा कि नाम से ही अर्थ निकल रहा है “रंग में मतभेद करने वाले, काले और गोरे लोगो के बीच रंगभेद संघर्ष
भारत देश विविध धर्म, जाति,और रंग का प्रतीक है,यह विविधता वाला देश है, परन्तु कहीं ना कुछ सामाजिक बुराइयां है, जिनको देश में रह रहे लोगों को सामना करना पड़ता है, जाति वाद (RACISM) और रंगभेद (APARTHEID) यह ऐसी सामाजिक बुराइयां होती है जिनमे समय समय पर लोग एक दूसरे के विरूद्ध खड़े हो जाते है।

रंगभेद भाव को समाज से दूर करने का संघर्ष में गांधीजी का बड़ा योगदान रहा है, उन्हें इस भेद भाव का असर तब हुआ, जब रेल यात्रा के दौरान जरनल डब्बे में बैठ गए थे, वहां से गांधी जी को रंगभेद भाव के कारण डब्बे से नीचे फेंक दिया गया, उसके बाद गांधी जी ने इसका संघर्ष करना शुरू कर दिया।
दूसरे ऐसे ही दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला
अफ्रीका में जब नेशनल पार्टी की सरकार द्वारा काले और गोरे लोगों के बीच मतभेद करवा या
और उनको अलग अलग जगह रहने कि हिदायत दी, नेल्सन मंडेला ने इसका पुरजोर विरोध किया, और काफी साल संघर्ष किया, इन्हीं संघर्ष के बाद इनको बहुत साल तक जेल में रहना पड़ा,
जैसे भारत के लिए गांधीजी ने रंगभेद के लिए संघर्ष किया उसी तरह नेल्सन मंडेला ने भी अफ्रीका में संघर्ष किया।

क्या वर्तमान में आज भी रंगभेद जिंदा है ?

समाज में आज भी रंगभेद भाव उतना ही उग्र है जितना पहले था, समाज में लोग आज भी गोरे और काले लोगो के बीच मतभेद करते है, लड़कियों के काले रंग पर बचपन से ही उनके साथ दुष्वयहार किया जाता है।
लड़के लड़कियों को काले रंग पर उनको हिन भावना की तरह देखा जाता है।

रंगभेद भाव के बढ़ावे के लिए ज़िम्मेदार कोन है

रंगभेद के बढ़ावे के जिम्मेदार कोन है हमारा समाज जिनको देश के लोग को अलग अलग नजरिए से देखा जाता है, इस कारण देश, विदेश में लोग जाति,धर्म,लिंग,भाषा,और रंग के आधार पर अपना अलग राज्य या शहर बसा लेते है।
हम क्यों रंग के आधार पर लोगो के अलग नजरिए से क्यों देखते है, आय दिन देश ,विदेश में रंग और जाति धर्म के नाम पर दंगे हो जाते है,

रंगभेद भाव में हुए हाल ही में अमेरिका में दंगो ने बवाल मचा दिया, गोरे काले रंग पर हुए दंगो ने काफी जाने ले ली। अधिकांश रंगभेेद को बढ़ावा देने में FAIRNESS CREAME का बड़ा हाथ है।

कम्पनियां अपने विज्ञापन की बढ़वा देने के लिए नए नए विज्ञापन बनाती है, वहा “गोरा होने हेतु क्रीम” इस शब्द को उपयोग में लाकर समाज में गोरे काले लोगो के बीच मतभेद करवाती है और गोरे रंग को अधिक ताववजो देती है।

हाल ही में सुनने को आया था कि Fair & lovely अपने नाम को बदलेगी क्युकी इसका शुरुआती अक्षर ” fair” हैं।
जब तक हम स्वयं को और नजरिए को नहीं बदलते वैसे ही हमारे समाज में सामाजिक बुराइयां बड़ जाती है, जब हम स्वयं बदल जायेगे धीरे धीरे हमारी जिम्मेदारी भी समाज की बुराईयों को दूर करने में लग जाएगी।
Racism, apartheid जैसी बुराइयां जल्दी ही हमारे देश,विदेश और विश्व से दूर हो जाएगी।
अंजू कंवर

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