पाज़ेब-ज़ेबा प्रवीण

पाज़ेब-ज़ेबा प्रवीण

बात हैं सन १९८४ की,उस समय साहिल की नई-नई शादी हुई थी वह एक सरकारी स्कूल का शिक्षक था,शादी के बाद ही उसका तबादला दूसरे गाँव में हो गया था जिसके वजह से साहिल और उसकी पत्नी रज़िया दोनों उस गाँव में रहने लगते हैं |

साहिल ने वहां रहने के लिए एक किराये पर घर लिया जो एक पार्क के बिलकुल सटीक था,उस जगह पर सिर्फ एक ही घर था जिसमे साहिल और रज़िया रहने गए आये थे लेकिन कुछ दुरी पर ही एक बस्ती थी उस बस्ती से लोग अक्सर उस दोनों से मिलने आया करते थे ,रज़िया कुछ दिन तक तो साहिल के साथ ही रहती हैं लेकिन उसके अब्बू की तबियत ख़राब होने की वजह से उसे अपने मायके जाना पड़ता हैं,रज़िया के जाने के बाद ही साहिल की ज़िन्दगी में ऐसा बदलाव आता हैं जिसकी वजह से उसका चैन सुकून सब ख़त्म हो जाता हैं|

रज़िया के गए दो तीन-दिन ही हुए होंगे,१२ नवम्बर १९८४ की सुबह,हर रोज़ की तरह साहिल आज भी ५ बजे उठ कर सैर पर जाने के लिए तैयार हो रहा था,साहिल एक टी-शर्ट और निक्कर पहन कर सैर पर निकल गया,सैर के लिए उसे ज़्यादा दूर भी नहीं जाना पड़ता था क्यूकि पार्क उसके घर के सामने ही था,सवेरे-सवेरे पार्क में बहुत सन्नाटा पसरा हुआ था जिसके चलते सिर्फ कुछ कीट-पतंगों की आवाज़े सुनाई पड़ रही थी,शाम के समय वहां पर हमेशा कई सारे लोग आकर बैठे हुए मिलते हैं लेकिन सुबह-सुबह मुश्किल से लोग देखने को मिलते थे,सर्दी का समय था इसलिए अभी सवेरा होने में समय था,ठंडी-ठंडी हवाएं चल रही थी जो बार-बार सर्दी बढ़ने का संकेत दे रही थी,पार्क में हल्की-हल्की रौशनी स्ट्रीट लाइट की वजह से आ रही थी ,साहिल ने स्वेटर नहीं पहना था उसे बार-बार ठण्ड का एहसास हो रहा था वह सोच रहा था कि जल्दी से टहल कर वापस घर चला जाऊंगा, साहिल ने अभी पार्क का एक ही चक्कर लगाया होगा तभी उसे किसी औरत के पायल की छन-छन आवाज़े आती हैं उसने सोचा शायद गाँव की कोई औरत होगी ,वह उस आवाज़ को अनसुना कर के पार्क की दूसरी चक्कर लगाने लगा और बार-बार इधर-उधर भी देख रहा था कि आखिर ये आवाज़ कहा से आ रही है,साहिल ने अब अपना दूसरा चक्कर भी पूरा कर लिया था,लेकिन वह ये नहीं समझ पाया की आखिर ये आवाज़ किस छोर से आ रही हैं ,साहिल अब अपना तीसरा चक्कर शुरू करने वाला था कि तभी अचानक से ज़ोर की हवा मानो उसी आसपास चलने लगी,हवा के सहारे लगा जैसे कोई उसके पीछे आके खड़ा हो गया हो वह पीछे मुड़ कर देखने लगा,थोड़ी ही देर में सब कुछ पहले जैसा हो गया हवाएं भी बिलकुल शांत हो गयी,हवा के शांत होते ही उसने आगे बढ़ने का सोचा उसने जैसे ही अपना दूसरा कदम आगे बढ़ाया उसे ऐसा अहसास हुआ जैसे उसके पैर के निचे कुछ हैं ,वह थोड़ा पीछे होकर निचे देखने लगा दरअसल उसके पैर के निचे एक पाज़ेब थी जिसकी आवाज़ उसे बार-बार अपनी ओर आकर्षित कर रही थी साहिल उस पाज़ेब को उठा कर अच्छे से देखने लगा ,तभी उसे लगा जैसे कोई एक पाजेब पहने उससे आगे आगे चल रहा हो,वह उस आवाज़ का पीछा करने लगा ताकि वह उसे उसका एक खोया हुआ पाज़ेब दे सके ,साहिल उस आवाज़ के पीछे-पीछे लगभग बीस मिनट तक भागता रहा लेकिन उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया ,वह थक कर एक बेंच पर बैठ गया,तभी उसे अहसास हुआ कि वह आवाज़ उसकी तरफ बढ़ रही थी ,जैसे-जैसे वह आवाज़ उसके करीब आ रही थी उसके चेहरे से पसीने छूटने लगे थे ,साहिल उस आवाज़ को महसूस करने के लिए बिलकुल शांत बैठ गया ,कुछ देर बाद वह आवाज़ बिलकुल उसके पास आकर बंद हो गयी, दूसरा वाला पाज़ेब अब भी साहिल के हांथो में ही था,आवाज़ के शांत होते ही वह उठ कर अपने आस पास देखने लगा ,उसे वहाँ कोई भी नहीं दिखा ,सवेरा हो चूका था सर्दी कि किरणे भी हल्की-हल्की देखी जा सकती थी ,साहिल वापस अपने घर आ गया और उस पाज़ेब को अपने बेड के ड्रॉ में रख दिया ताकि अगली सुबह अगर कोई उस पाजेब को ढूंढता हुआ आये तो वह उसे दे दें |
आज का दिन तो जैंसे तैसे कट गया ,जब रात हुई तब साहिल खाना-पीना खाकर सोने ही वाला था कि फिर से उस पाज़ेब कि छनछन की आवाज़े सुनाई देने लगी,साहिल उस दूसरे वाले पाज़ेब को लेकर उस आवाज़ के पीछे निकल पड़ा जो इस बार उसी के घर में से आ रही थी ,लगभग आधी रात तक वह उस आवाज़ के पीछे-पीछे दौड़ता रहा लेकिन अंत तक कुछ भी नहीं ढूंढ पाया,उसे अब ये अहसास होने लगा था कि शायद वो जिसे ढूंढ रहा हैं असल में कोई हैं ही नहीं कोई शैतानी हवा हैं जो उसे अपने में उलझाए हुए हैं वह यही सोचते-सोचते छत्त कि सीढ़ियों से वापस निचे आ रहा था तभी मानो जैसे किसी ने पीछे से उसे धकेला हो वो सीधा सीढ़ियों से निचे आकर गिरा,उसे काफी चोटे भी लग जाती हैं वह जैसे तैसे लंगड़ाते हुए अपने बैडरूम तक पहुंच गया उसे इतनी छोटे लगी थी के वो खुद से बेड पर चढ़ कर सो भी नहीं सकता था,वह अपने बेड से तकिया लेकर निचे ज़मीन पर ही सो गया अगली सुबह 8 बजे दूध वाले ने आ आकर उसे जगाया ,साहिल को गिरने की वजह से इतनी छोटे लगी थी के उसका हिम्मत नहीं हुआ स्कूल जान का,दूध वाले ने जाकर बस्ती के लोगो को साहिल के बारे में बताया उन लोगो ने आकर उसकी बहुत देख रेख की,दिन तो जैसे तैसे कट गया लेकिन शाम होते ही फिर से वो आवाज़ आने लगी,साहिल उस आवाज़ कि वजह से रात को सो नहीं पाया था वो भूल गया था कि उसके पास एक पाजेब थी ,जिस तरह से उसे एक पाजेब की आवाज ने परेशान कर रखा था वह उसे शैतानी साया मान रहा था,अंदरूनी चोट की वजह से वह उस घर से कही आ जा भी नहीं सकता था उसने एक पल के लिए सोचा की बस्ती के लोगो को बता दूँ लेकिन फिर उसने सोचा अगर ये लोग डर गए तो यहाँ आना बंद कर देंगे फिर उसकी देखभाल कौन करेगा इसलिए उसने किसी को कुछ नहीं बताया शाम होते ही पायल की आवाज़ आने लगती थी कभी किचन के बर्तन के गिरने की आवाज़ आती तो कभी किसी बच्चे,औरतो के रोने की आवाज़ आती थी वह इस सब से काफी डर गया था,अगले दिन दोपहर होते ही रज़िया का भाई उसे वहां छोड़ जाता हैं,वह साहिल कि हालत को देख कर दंग रह जाती है,साहिल कि वह सूजी हुई आँखे जो यह संकेत दे रही थी के ना जाने कब से वह सोया नहीं है,और हाथो में चोट के निशान उसे पूछने पर मज़बूर कर देता हैं, रज़िया ने जब साहिल से पूछा तब साहिल ने उसे उस पाजेब वाली बात बताई ही नहीं ,उसने उसे सिर्फ सीढ़ियों से गिरने वाली बात बताई थी,रज़िया ने उसके बातो पर विश्वास कर लिया लेकिन उसे लग रगा था के वो उससे कुछ छुपा रहा हैं,उसने उससे पूछा नहीं और थोड़ी देर बाद घर की सफाई में लग गयी साहिल को तबतक एक वैद जी के यहां भेज दिया था ताकि उसके चोट का इलाज जल्द हो सके,सफाई के दौरान उसे वो पाजेब मिली,वो उसे हाथ में रख कर सोचने लगी ये एक अकेला पाजेब उसके कमरे में कहाँ से आया उसे लगा शायद उसके जाने के बाद कोई औरत साहिल से मिलने आती थी और शायद ये उसी का पाजेब हो सकता हैं वह फ़ौरन उस पाज़ेब को लेकर बस्ती में चली गयी और सब को वो पाजेब दिखा कर पूछने लगी के ऐसा पाजेब किसका हैं..?,वही पर एक सोनार बैठा हुआ उस पाजेब को देख रहा था उसने जब अपने हाथ में लिया तो देखते ही कहने लगा’इस तरह की चांदी अब कोई नहीं रखता हैं,ये तो लगभग बरसो पुराना पाजेब हैं अब कोई नहीं पहनता इस तरह के पजेबो को ये ज़रूर सैकड़ो साल पुराना पाजेब हैं,उस सुनार की बात सब बहुत ध्यान से सुन रहे थे उतने में एक औरत बोल पड़ी,ये कही पजेरी की पायल तो नहीं हैं….उतने में एक और औरत बोल पड़ी,वो तो ऐसी ही मर्दो के तलाश में रहती हैं जिसकी बीवी न हो मास्टर साहब को अकेला देखि होगी तो लगवा दी होगी उसको पीछे….|

रज़िया उनकी बाते सुनने के बाद पूछने लगती है”ये पजेरी कौन हैं आप सब किसकी बात कर रहे”रज़िया के पूछने पर गांव वाले उसे पजेरी के बारे में बताते हैं”पजेरी एक काली विद्या जानने वाली औरत थी जिसे लगभग बीस साल पहले ही इस गांव से लोगो ने निकाल दिया था और अब वो एक जंगल में रहती हैं…,रज़िया के पूछने पर वो लोग कारण बताते हैं:-

पजेरी हमारे गांव में हर दूसरे दिन एक नयी समस्या लेकर आती थी उसका पति उसे हमेशा मरता और पीटता रहता था जिसका बदला वो हम लोगो से लेती थी,कभी वो चची के बेटे को बीमार कर देती तो कभी हमारे जानवरो को मार देती अपनी शक्तियों से इसलिए हम सब ने उसको यहाँ से निकाल दिया और अब वो इस खुंदस में वही से हम पर काली विद्या का जादू करती रहती हैं,अब तो सुना है वो भटकती आत्माओ से भी बात करने लगी हैं,वही करवा रही होगी मास्टर जी के साथ,उनको उसी ने नुक्सान पहुचाया होगा |

रज़िया ये सब सुन कर उनसे विनती करती हैं कि अब उससे छुटकारा कैसे पाया जाए …गांव के लोग उसे एक बाबा के पास ले जाते हैं जो हर बार पजेरी के काली शक्तियों का तोड़ निकालते थे,इस बार भी वो उनकी मदद के लिए तैयार हो जाते हैं,वो रज़िया से कहते हैं की सूरज डूबने से पहले ही इसे किसी ऐसे जगह गाड़ दो ताकि कोई लोग इसके पास नहीं पहुंच सके,क्यूकी जितने भी लोग अभी उसे देख रहे है ये रात को सब को परेशान करेगी,रज़िया और गांव वाले बाबा के कहे के मुताबिक करते हैं उसे उस पार्क के एक छोर पर ले जाकर गाड़ देते हैं,तबतक साहिल भी वैद जी के पास से आ जाता हैं,रज़िया साहिल को सारी बाते बता देती हैं और उसी समय वह दोनों उस घर को खाली कर के बस्ती में रहने लगते हैं |

 

    ज़ेबा प्रवीण  

    डाबरी, दिल्ली

Zebe Parveen

मैं ज़ेबा परवीन डाबरी नई दिल्ली की निवासी हूँ। मै वास्तविक जीवन से सम्बंधित कहानिया लिखती हूँ।

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