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रिश्ते का पंचनामा-फौजिया

रिश्ते का पंचनामा- एक रात
मनीष ने अपनी पत्नी का कत्ल कर दिया था, मनीष की पत्नी सुधा की लाश बेड पर पड़ी थी मनीष ने एक छोटी सी बात पे ही अपनी पत्नी को खत्म कर डाला था सुधा जब चिल्लाना शुरू करती तब तक चिल्लाती जब तक की मनीष हार के सरेंडर न कर देता। अंत मे हार जाता था वो सुधा से । अब तो वो जान बूझ के हारने लगा था। क्युंकि ऊब चुका था सुधा की हरकतों से।
आज भी वो घर मे थका हारा आया घर मे पैर रखते ही सुधा ना जाने कौन सा नया विषय ले कर बैठी थी जैसे ही मनीष आया सुधा शुरू हो गयी आज वैसे ही मनीष के ऑफिस मे भी बॉस से झड़प हुयी थी मनीष इस्तीफा दे आया था आज लेकिन घर मे सुधा से बहुत कुछ कहना चाहता था, गले लगकर अपने दुःख बांटना चाहता था । लेकिन…..
मनीष को गुस्सा आया और सुधा को एक झटके मे… इस दुनिया से विदा कर दिया अब आज़ाद हो गया था। उसने आज बहुत दिन बाद चैन की सांस ली थी। हालांकि उसने सही नही किया था।
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मनीष एक तरफ कुर्सी पे बैठा सब बातें बस सोच रहा था। कैसे जब वो पहली बार यूनिवर्सिटी मे सुधा से मिला था इलेक्शन था, सब तरफ शोर था सब अपने अपने कैंडिडेट का प्रचार कर रहे थे। सुधा भी अपने कैंडिडेट का प्रचार कर रही थी। कभी कभी दोनों मे ज़ोरदार झड़प भी हो जाती। लेकिन वो सुधा को बहुत पसंद करता था सो सुधा के नखरे भी उठा लेता था।, लेकिन कभी कभी चाय की स्टाल पे दोनो चाय पीने जाते तो एक दूसरे से खूब बाते करते । धीरे धीरे दोंनो एक दूसरे से मुलाकाते करने लगे ।
तभी सोचते सोचते मनीष को कुछ टप टप की आवाज़ें सुनाई देती है चौकता है अरे!! सुधा के शरीर से काफी खून बह कर गद्दे मे फैलते हुए बेड से गिर रहा था टप टप की आवाज़ें आ रही थी। मनीष देखकर बहुत पछता रहा था देख कर। कुछ देर पहले खुशनुमा यादों मे डूबा था सुधा के प्यार की यादों मे सराबोर था । सुधा की ये हालत उसने कर दी ये सोच कर वो सुधा से खूब लिपट के रोता है । और… रोते रोते सुधा के पास ही बैठे बैठे सो जाता है।
मनीष सुधा को बहुत प्यार करता था सो वो अभी तक सुधा को मरने के बाद छोड़ के भागा भी नहीं था।
थोड़ी देर बाद मनीष की नींद खुलती है तो फिर जाकर कुर्सी पे बैठ कर सिगरेट जलाकर पीने लगता है तभी फिर सोच मे डूब जाता है ।
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मनीष की पढाई पूरी हो गयी थी उसने अपनी माँ से बहुत ज़िद करके सुधा से शादी कर ली थी। उसकी माँ ने पहले मना किया था, बोली थी कि रिश्ते को थोड़ा टाइम दो और समझो। लेकिन मनीष को तो जैसे जल्दी थी शादी करने की,। कैसे सुधा परियों जैसी लग रही थी घर मे उसने कैसे प्रवेश किया था। मनीष के जीवन मे तो जैसे बहार आ गयी थी। इतनी सुंदर पढ़ी लिखी प्यार करने वाली बीवी । मनीष की अच्छी कंपनी मे नौकरी लग गयी थी। वो भी सुधा के आते ही। सुधा भी किसी अच्छी जगह नौकरी पे लग गयी थी। अब तो सुधा कहती उठ जाओ तो उठ जाता। कहती बैठ जाओ तो बैठ जाता इतना प्यार करता था, दोनो अपने करियर मे बिज़ी हो गये थे जब मिलते बस बहस होती। सुधा तो बोलना स्टार्ट करती, बस बोलती ही जाती ।
एक दिन सुधा को फीवर था वो घर जल्दी आ गयी थी और खाना बना कर जल्दी सो गयी थी जब मनीष घर आया तो माँ से पूछा सुधा कहाँ है माँ ने कहा “अपने कमरे मे होगी!! ”
अपने बेडरूम मे जैसे ही मनीष प्रवेश करता है मद्धिम लाइट मे सुधा नीली नाइटी मे बहुत खूबसूरत लग रही थी। फीवर से तप रही थी, मनीष ने पूरी रात सुधा की देखभाल की। उसने मन ही मन फैसला किया बहुत हुई लडाई अब से सुधा का बहुत ख्याल रखेगा। उसने बहुत प्यार किया था सुधा को और पूछा था –
“सुधा हम दोनो मे फालतू बहस होती है, मै चाहता हूँ कुछ ऐसा करूँ जिससे तुम खुश हो जाओ ।
” सुधा कहती है आई लव यू मनीष मुझे कुछ नही चाहिए बस तुम्हारा प्यार और केयर चाहिए।
पूरी रात सुधा को बहुत प्यार किया था मनीष ने। कुछ सोच विचार मे भी डूबा रहा था । कि सुधा को खुश कैसे रखू।
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आज बहुत दिनों बाद बहुत खुश था वो एक अच्छा तोहफा देने वाला था सुधा को। उसने एक अच्छा मकान लिया था । आज सुधा को नये मकान की चाभी गिफ्ट करता है
सुधा खुशी से झूम उठी थी एक तो उसने सुंदर से बेटे को जन्म दिया था दूसरे उसे नया मकान का गिफ्ट मिला था।
एक तरफ सुधा की लाश पड़ी थी मनीष की आँखो मे फिल्म की तरह यादें चल पड़ी थी। जो उसके हांथो हुआ था वापस सही कैसे हो सकता था? ? नहीं बिल्कुल नहीं।
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आज मनीष ने माँ से बोला नये घर मे शिफ्ट होना है तैयारी कर लो। माँ ने कहा था बेटा ये मेरा घर मेरे पति ने बनाया था तूने अपनी पत्नी के लिए घर बनाया। मै यही रहूँगी मरते दम तक उनकी यादों के साथ। तुम सुधा को उस घर मे प्यार से रखो।
सुधा नये घर मे जाकर बहुत खुश थी मनीष और सुधा दोनो आये दिन दोस्तों को बुलाते पार्टी करते अब अक्सर पैसे कम पड़ने लगे थे महीने के अंत मे ।घर की ज़रूरतें भी बढ़ती जा रही थी। सुधा अक्सर मनीष से कहती की माँ की पेंशन मे से कुछ पैसे मांग लो। मनीष मना कर देता कहता कि बुरा लगता हैं माँ साथ मे नहीं रहती तो क्यों मांगने जाऊँ। लेकिन एक दिन इतना चिल्लाई सुधा तब जाकर मनीष माँ के घर जाने की हिम्मत कर पाया। माँ को उड़ती उड़ती खबर लग चुकी थी मनीष के हालात की। माँ हर महीने अपनी आधी पेंशन मनीष को चुपचाप दे देती। अब तो जैसे मनीष भी कट्टर होता जा रहा था बीमार माँ का हाल पूछने ना आता लेकिन पेंशन लेने आ जाता। सिर्फ सुधा के चिल्लाहट और झगड़े से शांति के लिए। मनीष की बहन, जिसकी शादी हो चुकी थी उसे जब बदलते मनीष की गिरी हरकत के बारे मे पता चला तो उसने समझाने की कोशिश की लेकिन मनीष ने उससे भी रिश्ता तोड़ लिया क्युंकि वो शायद सुधा से डरने ही लगा था गलतियाँ करता जा रहा था अपनों से दूर होता जा रहा था।
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ये सब घटनाक्रम के सोचते हुए मनीष बहुत दुखी होता है आँखों से बेबसी के आंसू निकल पड़ते है उठता है सुधा की लाश को ज़ोर ज़ोर से झिन झोड़ता है सब बाते बोलता है जो भी उससे गलतियाँ हुई थी और ज़ोर ज़ोर का थप्पड़ लगाता है अगले पल पागलों की तरह हँसने लगता है कहता है “सुधा तुम मेरा आज कुछ नही बिगाड़ सकती ना कुछ बोल सकती हो पहले;; बोलती ही जाती थी,बोलती ही जाती थी चुप ही नहीं होती थी। और आज!??!!हा! हा! हा!
फिर मनीष की आँखों मे एक शून्य सा छा जाता है वो कुर्सी पे बैठकर सिगरेट पीने लगता है। और सुधा की लाश को देखता रहता है चुप चाप।।
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अगले पल फिर उसके सामने सारा वो मंज़र घूमने लगता है कि कैसे उन दोनों ने एक दूसरे से टूट कर प्यार किया था सुधा भी बहुत अच्छी थी लेकिन वो उसकी कुछ गलतियों को मज़ाक मे नज़र अंदाज़ कर देता था इससे सुधा की गलतियों को बढ़ावा मिलता जा रहा था। उसने अपनी माँ का ख्याल रखना छोड़ दिया सुधा को खुश रखने के लिए। लेकिन सुधा उसकी अच्छाई और घर मे शांति की खातिर समझौते को उसकी कमज़ोरी समझती जा रही थी । अब तो दोनो की नज़्दीकिया कम होती जा रही थी उनके बीच रह गया था सिर्फ अहं और समझौता। उसे इंतेज़ार था सुधा कभी तो उसे समझेगी। लेकिन ऐसा कुछ नही होने वाला था शायद । चार दिवारी मे अंजाने लोग ही थे अब शायद। सुधा को भी शायद यही इंतेज़ार रहा होगा तभी तो वो मनीष की हर छोटी से छोटी ज़रूरतों का ख्याल रखती थी लेकिन उसके प्यार करने और जताने का तरीका शायद यही था बस छोटी छोटी बात पे झगडा चिल्लाना। जिसे शायद मनीष भी नहीं समझ पा रहा था उसने ही तो सुधा को ऐसा बना डाला था, अगर वो सुधा की कमियों को नज़र अंदाज़ ना करके वहीं रोक देता और रिश्तों को समझने की कोशिश करता तो शायद आज उसे अपना मानसिक संतुलन ना खोना पड़ता सब सही रहता आज भी।
अचानक सुबह पांच बजे का अलार्म बजता है जो रोज़ ही बजता था सुधा सुबह सुबह उठ कर उसे चाय नाश्ता लंच बॉक्स देती देती फिर दोनो अपने अपने काम को निकल जाते लेकिन अब ऐसा कुछ नही होने वाला था अब।
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मनीष को अपनी गलतियों का अहसास हो चुका था जो वो कई सालों से करता आया था अपने सारे रिश्ते भी कहीं खो आया था इस रिश्ते के लिए जिसे आज पूरी तरह से खो दिया था।
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मनीष बहुत रोता है बिलख बिलख कर, पुलिस को कॉल करता है। खुद को सज़ा दिलवा कर पश्चताप करने को।

(मेरी इस मनोवैज्ञानिक मनोविकार और व्यवहार के सरोकार से सजी कहानी का यही मतलब है कि अपराध कई सालों की चली आ रही गलतियों का परिणाम होता है।हमे हर वक़्त दूसरे की गलतियों को बढ़ावा ना देते हुए नज़र अंदाज़ ना करते हुए अपने सारे रिश्ते संभाल कर रखने चाहिए और उत्तेजना मे कोई भी कदम चाहे प्यार हो या नफरत, दोनो घातक होते है न???

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