Pratibha Khadekar 23 Sep 2026 कविताएँ दुःखद Pratibha Khadekar 1280 0 Hindi :: हिंदी
एक समंदर प्यासा था
रचना -प्रतिभा खडेकार
एक समंदर प्यासा था,
रेत महा जमीन सुक्खा था।
लहरों ने तो घेरा किनारा,
ना अंश शेष बचा था ओस।
एक समंदर प्यासा था।
आंँखों में चाहत थी
कुछ पाने की।
नसीब सबकुछ छिन ता ही
चला गया।
आस फिर ढूंढती मन जो ना
होता कमजोर।
एक समंदर प्यासा था।
समय सदियों पुराना था,
चूल्हे में कागज का टुकड़ा
और फटे कपड़े जला करते थे।
लकड़ी भी खरीदने तक की
औकात नहीं थी।
एक समंदर प्यासा था।
आज सौ की नोट एक रुपए के
भाव बिकती है बाजार में।
जब की सदियों पहले नैन
तरस जाते एक रुपए की नोट
देखने में।
एक समंदर प्यासा था।
- प्रतिभा खडेकार