Shreyansh kumar jain 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक 500000 61683 1 5 Hindi :: हिंदी
जन्म हुआ ता मेरा जब भी मै एक किस्सा बना, चल जाऊं जब इस दुनिया से तो बन जाऐगा मेरा एक ओर किस्सा, माँ- बाप को दिया जो दर्द मेने बचपन में उन किस्सों का मे कैसे मान चुकाऊंगा, जब- जब मैं बचपन की उन यादों में खो जाऊंगा, अपने उस बचपन के किस्सों में खोकर दिल में सुकून सा पाऊंगा ।। बडा हुआ मैं दादी- नानी के किस्सों का भी खूब स्वाद चका, बाबा ओर नाना के किस्सों को भी मैं बेखुबी से खूब सुना, किस्सों के इन अहसासों से ही मैं दुनिया का मतलब समझा, जीवन में संस्कार और संस्कृति को भी किस्सों से में बेखुबी समझा । आजादी के किस्सों को सुनकर मैं उन में रम जाता था, सुभास, गाँधी ओर कलाम के किस्सों को सुनकर मैं देशभक्ति में रम जाता था, देश भक्ति के किस्सों को सुनकर ही मैं पला-बडा, फाँसी के फंदे को चुमा ऐसे वीर भगत सिंह को भी मेने किस्सों में खुब सुना। जीवन के इस किरदार में किस्सों की कोई कमी नहीं, कभी बचपन तो कभी प्यार के किस्सों भी की कोई कमी नहीं, जब हुआ प्यार हमे किसी से तो वह भी जीवन का एक किस्सा बनी, जब लिखा कविता आज किस्सों की तो सबसे ज्यादा आज उसकी है कमी खली । जन्म हुआ ता मेरा तब जब भी मै एक किस्सा बना, चल जाऊं जब इस दुनिया से तो बन जाऐगा मेरा एक ओर किस्सा ।
3 years ago