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पतझड़ का श्राप

VIJAYPAL 30 Mar 2023 कविताएँ अन्य पतझड़ का श्राप 98437 0 Hindi :: हिंदी

पत्ते जो हम लटक गए। 
न मालूम था हमको।
साथ छोड़ दोगे। 
न सुंदरता है। 
मन निरश होता है। 
देख सुखे ठंठल को।।

लहराए थे, ऊंचे आसमान में। 
गिराया है, काल के बदलाव ने।। 
न दिया साथ, उस महान ने।
जहां लटक रहे थे, अपमान में। 
 खत्म किया हमको, पतझड़ के श्राप ने।।

 शक्ति वृद्धि हुई आपकी। 
सुंदर रूप साथ लिए। 
अब बन जाएगी राख हमारी। 
आएगा मानव आग लिए।। 

अरे सुनो महान-
 बने हुए थे बावर्ची, प्रकृति के सहयोग से
छोड़ रहे हो सारे नाते,नई  वृद्धि की आड़ में।। 

पेड़ कहता है
 तंग हूं में 
सुन पराय  इन शब्दों से। 
कैसे पाऊं विमुक्ति, इस द्वि मासिक दाग से।। 
कोमल - सुनहरी रूप से। 
आपका वंश आएगा। 
हवा के साथ मिलकर एक मधुर गीत गाएगा।। 

 थे जब हम एक साथ ।
तब आपका कहना माना था। 
हो जाए बुजुर्ग। 
तो स्वर्ग उनको जाना है।
बदलते समय का एक नया जमाना है।।

कविता का सार-
                       पत्ते वृक्ष के तने को कहते हैं की हम तेरी टहनियों पर लटके हुए थे और लटकना एक अपमान है। तुमने हमारा साथ छोड़ दिया अर्थात नई वृद्धि की लालसा में हमें नीचे गिरा दिया है। सूखे वृक्ष को देखकर हमारा मन दुखी होता है। एक समय था जब हम आसमान में ऊंचाइयों पर लहरा रहे थे। लेकिन आज इस पतझड़ ऋतु के कारण सूख कर नीचे गिर गए हैं और तुमने हमारी बिल्कुल भी सहायता नहीं की है। अब तुम्हारी तो वृद्धि हो रही है लेकिन हम सूखे पत्तों को कोई मानव जलाकर नष्ट कर देगा। क्या यह सही है? अरे वृक्ष, हम पत्तियां तुम्हारी बावर्ची थी तुम्हें भोजन देना हमारा कर्तव्य था और फिर भी तुमने हम पर दया नहीं की और सारे नाते तोड़ दिए। 

वृक्ष कहता है   - कि मैं भला क्या करूं। मुझे भी दुखी हूँ। मुझे बार-बार इस पतझड़ की ऋतु में यह शब्द सुनने को मिलते हैं। मैं इस पतझड़ के श्राप से किस प्रकार छुटकारा पाऊ। 
तुम चिंता न करो तुम्हारा एक नया सुंदर रूप आएगा और बुजुर्गों को स्वर्ग के लिए जाना ही पड़ता है। यही इस सृष्टि का नियम है। 

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