नागमणि कुमार सिंह 26 Sep 2026 कविताएँ समाजिक प्रकृति और मानव 2156 0 Hindi :: हिंदी
प्रकृति और मानव प्रकृति मुस्करा रही हैं, मानव पर तरस रही हैं। फूल भी खिल रहे हैं, पक्षी भी गा रही हैं। पेड़-पौधे झूम रहे है, तितलियां भी घूम रही है। हवा भी चल रही हैं, नदी भी बह रही हैं। प्रकृति हँस रही है, मानव पर तरस रही है। धूप भी खिल रही हैं, चांदनी छटा बिखेर रही है। बादल भी बरसता हैं, झरना भी गरजता है। पहाड़ पहरा दे रहा है, समुन्द्र लहरा रहा है। प्रकृति सब देख रही है, मानव पर तरस रही है लेखक:नागमणि कुमार सिंह