शरद भूषण मोंगरा 07 May 2026 कविताएँ प्यार-महोब्बत सब कुछ बोल गई 6262 0 Hindi :: हिंदी
"वह फिर भी सब कुछ बोल गई" बिन साज श्रंगार किए ही वह मनभावन तरुणी लगती थी चपल नहीं थी शांत भाव में खिली कुमुदिनी लगती थी वह कुमारी सुकुमारी मधुबन पे जवानी लगती थी धीर दिशाओं में बजती सी मधुर रागिनी लगती थी प्रकृति की सुरसुंदरी थी सारंगी सी हंसती थी लोल लाज से झुके हुए वह दिल का दर्पण खोल गई और अधर तनिक से हिले नहीं वह फिर भी सब कुछ बोल गई। शबिन साज श्रंगार किए ही वह मनभावन तरुणी लगती थी चपल नहीं थी शांत भाव में खिली कुमुदिनी लगती थी वह कुमारी सुकुमारी मधुबन पे जवानी लगती थी धीर दिशाओं में बजती सी मधुर रागिनी लगती थी प्रकृति की सुरसुंदरी थी सारंगी सी हंसती थी लोल लाज से झुके हुए वह दिल का दिल का दर्पण खोल गई और अधर तनिक से हिले नहीं वह फिर भी सब कुछ बोल गई। शरद भूषण मोंगरा कवि गीतकार लेखक