खो जाती हूँ मैं कभी-कभी
गुज़रे दिनों के ख्यालो में ...
क्या होता अगर जी रहे होते हम
आज भी अंग्रेजो के ज़माने में ...
चाबुक खाते, धूल फ़ाख्ते
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गहरी अंधेरी रात के बाद, सुहानी भोर आती है
जेष्ठ की तपिश के बाद, घटाएं घनघोर छाती हैं
'यह भी नहीं रहेगा' का भाव, दुःख का दुःख भुलाता है
तू� read more >>