ललित दास निर्मोही 17 Aug 2026 शायरी दुःखद #शायरी #Shayari #हाथ_क्यों_दबा_रहे_थे #sad_shayari 18235 0 Hindi :: हिंदी
उनको मुझपर गुस्सा इतना था कि वो दाँत चबा रहे थे, उनको मुझपर गुस्सा इतना था कि वो दाँत चबा रहे थे, वो बोलते तो थे कि मुझे तुमसे प्यार ही नहीं है, तो फिर बताओ वो चुपके से मेरा हाथ क्यों दबा रहे थे..... उनको मुझपर गुस्सा इतना था कि वो दाँत चबा रहे थे, वो बोलते तो थे कि मुझे तुमसे प्यार ही नहीं है, मगर अंदर ही अंदर किसी अपने को खोए जा रहे थे। मोहब्बत की इस कशमकश में हम टूटे जा रहे थे, वो बेरुखी की चादर ओढ़े हमसे रूठे जा रहे थे। जुबां पर थी उनके नफरत की एक लंबी सी कहानी, मगर उनकी आँखों से बहता दर्द सब कुछ बता रहे थे। शिकायतों का अंबार लगाए वो महफिल में बैठे थे, हम पर इल्जामों के हर तीर वो कतार में बैठे थे। ज़माने को दिखाने को हमसे नजरें चुराते थे वो, मगर तन्हाई में हमारे आंसुओं को छुपा रहे थे। मोहब्बत के उसूलों पर वो पहरे हजार लगा रहे थे, हर बात पर हमें अपनी जिंदगी से बिसरा रहे थे। अगर दिल में जरा भी हमारे लिए चाहत न थी कोई, तो फिर बताओ वो चुपके से मेरा हाथ क्यों दबा रहे थे.....