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धार्मिक
धर्म तर्क वितर्क की वस्तु नहीं है-यह साक्षात्कार का विषय है
पहले तुम शास्त्रों के अर्थ स्वरूप आत्मज्ञान को गुरु कृपा से प्रत्यक्ष जानो, तब कुछ "धर्म" के विषय में समझ सकते हो। "धर्म" तर्क-वितर्क कर�
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बन राधा कभी तेरे प्रेम में-रंग जाती हूं
बन राधा कभी तेरे प्रेम में रंग जाती हूं तो कभी बन मीरा तेरी भक्ति में रम जाती हूं कैसा खेल है रचाया तूने कान्हा देखू जो एक झलक तेरी बस त
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श्री राम जी-उसे छोड़ने का इरादा कभी नहीं था
उसे छोड़ने का इरादा कभी नहीं था। लेकिन करते भी क्या उसने मजबुर ही इतना कर दिया था
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श्री कृष्णा-गीता में लिखा जिसने साथ दिया उसका साथ दो
गीता में लिखा जिसने साथ दिया उसका साथ दो । जिसने तुम्हें त्याग दिया उसे तुम भी त्याग दो।
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श्री राम जी-वक़्त कब क्या रंग दिखाए हम नहीं जानते
वक़्त कब क्या रंग दिखाए हम नहीं जानते वरना जिस राम को राज्य मिलने वाला था उस समय वनवास मिला
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कान्हा-मेरी मोहब्बत अधुरी क्यों लिखी
पूछा ऊपर वाले से। मेरी मोहब्बत अधुरी क्यों लिखी । वो भी कह कर रो पड़ा मुझे भी राधा कहां मिलीं।
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कान्हा-राधा ने मुस्कुरा के कहा बस मेरे नसीब में
कान्हा ने राधा से पूछा ऐसी एक जगह बताओ जहां में ।नहीं हूं। राधा ने मुस्कुरा के कहा बस मेरे नसीब में ।
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हे माता रानी-बहुत बुरे दिन चल रहे हैं
बहुत बुरे दिन चल रहे हैं कि आज अच्छा होगा है। कल अच्छा होगा। यह सोच कर दिन काट रहे हैं मां।
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कान्हा- किन शिकायतौ के हम शिकार हो गए
कान्हा पता नहीं किन शिकायतौ के हम शिकार हो गए। जितना साफ दिल रखा उतने गुनाहगार हो गए ।
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कान्हा- किन शिकायतौ के हम शिकार हो गए
कान्हा पता नहीं किन शिकायतौ के हम शिकार हो गए। जितना साफ दिल रखा उतने गुनाहगार हो गए
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प्राथना-व्यक्ति के मन ईश्वर का होना अति आवश्यक है
प्राथना करते समय व्यक्ति का मन्दिर में होना आवश्यक नहीं किंतु व्यक्ति के मन ईश्वर का होना अति आवश्यक है
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ज़िन्दगी- महेनत करो रुकना नहीं
ज़िन्दगी से यही सीखा है महेनत करो रुकना नहीं हालत कैसे भी हो किसी के सामने झुकना नहीं
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