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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
@ sandeep-kumar-singh
, Bihar
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me.
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जो बित गया वक्त -वो फिर न आयेगा
(मुक्तक) जो बित गया वक्त, वो फिर न आयेगा। रोशनी के सामने कभी, अँधेरा न आयेगा। हौसला है - जुनून है, चमकीली चाहत है - मोहब्बत के सामने,
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संघर्ष और समाज-संघर्ष के बाद समाज कि स्थिति असंतुलित
संघर्ष के बाद समाज कि स्थिति असंतुलित हो जाती लगभग सही क्षेत्रों मे कमोबेश अभाव का ही मंजर होता है। सारे नुकसान कि एक साथ तत्काल भरपाई
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समाज और मनुष्य
समाज मनुष्य को समाज के उपयोग में आने के लिए शिक्षित करता है। कोई भी समाज किसी भी मनुष्य की आत्मिक विकास की चिंता नहीं करता है, यह विकास �
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करते नहीं विचार जो-करते कुछ भी काम
#विधा:-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" करते नहीं विचार जो,करते कुछ भी काम। आये जब परिणाम तो,लगता उसे लगाम।। करते नहीं विचार जो,औ
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छठ माई की शाम पर-सजा हुआ है घाट
#विधा:-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" छठ माई की शाम पर,सजा हुआ है घाट। पूजा पूजा मय हुआ,अनुपम है नव ठाट।। छठ माई की शाम है,आज सुह�
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उजला तन किस काम का-काला जब हो सोच
#विधा:-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" उजला तन किस काम का,काला जब हो सोच। ऐसे जन सब ही यहाँ,करते रहते नोच।। उजला तन किस काम का,जिसक
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करते नहीं विचार जो-उसे बुद्धि है भ्रष्ट
#विधा:-मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" करते नहीं विचार जो,उसे बुद्धि है भ्रष्ट। उल्टे सीधे काम से,करे प्रगति को नष्ट। और गँवा�
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करते नहीं विचार जो-रहे सदा बेरंग
#विधा:-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" करते नहीं विचार जो,करते कुछ भी काम। आये जब परिणाम तो,लगता उसे लगाम।। करते नहीं विचार जो,औ
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क्या कहूं आज मैं आप से- डरता मैं हूं बहुत पाप से
क्या कहूं आज मैं आप से। डरता मैं हूं बहुत पाप से। मैं प्यार का एक मस्त राही- डरूं नहीं कद की नाप से । (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिं�
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जब से मैंने तुझको जाना है
जब से मैंने तुझको जाना है। दिल तुझको अपना माना है। आँखों में जो न समाये - प्यार का तूँ अनमोल खजाना है। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुम
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