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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
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संदीप कुमार सिंह
@ sandeep-kumar-singh
, Bihar
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me.
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काटे कटी न रात अब-आँखों में है नूर
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" काटे कटी न रात अब,आँखों में है नूर। कदमों में है जोश अति,खुद पे करूं गुरूर। परचम अपना ही उ�
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तेरी क्या औकात है-पहने हुए नकाब
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" तेरी क्या औकात है,पहने हुए नकाब। बातें भी बेकार है,रखता नहीं जवाब। मैं तो हूं अब शेर दृढ�
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जीना है तो सीख ले-श्रम करना ओ यार
विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" जीना है तो सीख ले,श्रम करना ओ यार। मिले मेहनत से खुशी,छोड़ो मत अधिकार। करें यहां निर्माण,�
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उजला तन किस काम का-काला जब हो सोच
#विधा:-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" उजला तन किस काम का,काला जब हो सोच। ऐसे जन सब ही यहाँ,करते रहते नोच।। उजला तन किस काम का,जिसक
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रहस्य-दिव्य सुन्दरी जिसे देखते ही खुशी होता था
उसका आना और जाना मेरे लिए कौतूहक था, दिव्य सुन्दरी जिसे देखते ही खुशी होता था। बहुत ही रहस्यमय लग रही थी वो, पूरी शरीर में एक मादकता भर
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रात का दर्पण-चंचल चांदनी है जगमगाते तारें
चंचल _चांदनी है,जगमगाते तारें , महकी रात है। आंखों में आनंद की रौशनी है, लब पर मधुर गीत के बोल हैं। सफ़ेद आसमान यूं देख रहें हैं, जैसे उ�
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क्या कहूं आज मैं आप से-डरता मैं हूं बहुत पाप से
(मुक्तक छंद) क्या कहूं आज मैं आप से। डरता मैं हूं बहुत पाप से। मैं प्यार का एक मस्त राही- डरूं नहीं कद की नाप से । (स्वरचित मौलिक) संद�
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रोजी रोटी के लिए-परेशान हैं लोग
(दोहा छंद) रोजी रोटी के लिए, परेशान हैं लोग। कुछ जन को तो बहुत है,कुछ को कुछ मत भोग।। रोजी रोटी के लिए, करना पड़ता काम। करा मेहनत से मिले
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रहस्य मय रूप की रानी-कोई मेरे सपनों में आए
(मुक्तक छंद) रहस्मयी रूप की रानी कोई मेरे सपनों में आए। आकर मेरे दिल को सहला कर वह चुरा ले जाए। मेरा तो कोई वस चलता ही नहीं है अब कहूं क्�
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मैं तेरे नाम हो जाऊँ-तुम मेरे नाम हो जाओ
(मुक्तक छंद) मैं तेरे नाम हो जाऊँ, तुम मेरे नाम हो जाओ। मैं तेरा दिल बन जाऊँ,तुम मेरी धड़कन हो जाओ। मजनूं के तरह, जिल्लत नहीं है पसंद म
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