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Trishika Srivastava

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My Articles

जो चाहता है मिरी जीस्त यूँ ही बर्बाद रहे ख़ुदा करे वो शख़्स सदा आबाद रहे जिसके लब से निकली है मिरे हक़ में बद्दुआ मिरी दुआ है तमाम उम्र read more >>
मैं ये नहीं कहती हूँ कि बाकी भाषाएँ नेक नहीं अंग्रेजी बोलना अच्छा है पर हिन्दी त्यागना ठीक नहीं —त्रिशिका श्रीवास्तव ‘धरा’ read more >>
मिल जाए वक़्त ज़रा सा अगर तो लौट आना कभी अपने घर तुम्हे याद कर अक्सर रोता है आँगन में खड़ा वो बूढ़ा शज़र — त्रिशिका श्रीवास्तव ‘ read more >>
ज़िम्मेदारियों का बोझ कंधा तोड़ देता है कम उम्र में बाप गर दुनिया छोड़ देता है — त्रिशिका श्रीवास्तव ‘धरा’ read more >>
पिछला साल मिरी तारीकी मिटा कर गया बहुतों की असलियत दिखा कर गया ख़ुदा करे नया साल मुबारक हो सभी को वो साल तो सारे जहांँ में कहर ढा कर गय� read more >>
(1). साल का आखरी दिन है तुमसे मिलना ना-मुमकिन है दो-चार बरस और अभी हमें जीना तुम्हारे बिन है (2). सुलगते रिश्ते जल कर राख हो जाएँगे वो हमस� read more >>
(1). इसका एहसास नहीं है तुमको कितना दर्द देती है तेरी बेपरवाही कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मांगती है मेरे इश्क़ से रिहाई (2). एक सुबह ऐसी भी � read more >>
(1). सच कहा था तुमने कि इस जहाँ में सारे पत्थर हैं किसी को ज़ियादा अहमियत दो तो आंकते ख़ुद से कमतर हैं (2). ज़रा महसूस तो करो मेरी तन्हाई की पी read more >>
(1). खूबसूरत है जहाँ, मौसम रंगीन है न जाने क्यों फिर भी, मेरा दिल ग़म-गीन है (2). नवंबर के महीने में मुझे छोड़ गया था हाँ! वो मुझसे सारे नाते तोड़ read more >>
त्याग के सारी भाषाएँ, बस ब्रज की बोली बोलूँगी। श्याम तुम्हारी नगरी में, मैं जोगन बन कर घूमूँगी। निस-दिन तेरी मुरली की, मुझे तान सुनाई read more >>
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