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ग़ज़ल
प्रेम की तृषा बुझा ना सके
बता ना सके, जता ना सके हृदय की पीर मिटा ना सके भीतर-भीतर सिसक रही नयनो से नीर बहा ना सके युगों-युगों से प्रेम को तरसे प्रेम की तृषा बुझा
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मत ऊलझो हम हिन्दू से
मत ऊलझो हम हिन्दू से, हम लभ - कुस के ही बंसज है। बस समय बदला है, तिर के जगह अब, कलम चलता है।
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बरसात में भीगा करते थे
एक हम थे जो तुम्हारे रंग में रंगने! की चाहत लिए फिरते थे ! एक तुम थे जो हर रंग को ! बेरंग किए फिरते थे ! एक हम थे जो उनकी याद में दिन रात आं�
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ज़िंदगी-खुशियों के सागर में तैरो ज़िंदगी
रंग बदलती पल _पल खूब है ज़िंदगी, फिर भी बहुत ही हर्ष देती है ज़िंदगी। चाहत दिल में सैकड़ों जवां हुए हैं, खुदा जरा साथ दें दगा ने दें ज़ि
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हर पर्वत को झुका नही सकते
हर पर्वत को झुका नही सकते हर दरिया को सुखा नहीं सकते तुम हमे भूल जाओ भले ही लेकिन हम तुम कभी भुला नहीं सकते By - 📝sanam kumari Shivani
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करते थे इंतजार तुम्हारे आने की
करते थे इंतजार तुम्हारे आने की! दिल में कुछ उलझन है तुम्हें बताने की ! रास्ते अनजान थे ,मैं भी कुछ अनभिज्ञ ,थी दिल को बस तुम्हें पाने �
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मेरे अल्फाज
1 तुम्हारी इश्क़ की रुसवाई की चर्चा नहीं करेंगे,तन्हाई का गम पीकर हम तन्हाई में जी लेंगे। 2 यह आशिक़ी बड़ी जालिम है, कमबख्त गम देती है।आँख�
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दोस्ती-बहुत पूरानी है दोस्ती हमारी तुमसे दूर रहकर मुझे याद आती है तुम्हारी
बहुत पुरानी दोस्ती हमारी तुमसे दूर रहकर याद आती है मुझे तुम्हारी एक उम्र संग गुजारी है हमने साथ रहकर ये देख कर दंग रहती है ये दुनियां �
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जिसकी मोहब्बत में हमने अपनी ये जिंदगी बर्बाद कर डाली
जिसकी मोहब्बत में हमने अपनी ये जिंदगी बर्बाद कर डाली सिंचा जिसे मोहब्बत मैं बड़ी शिद्दत से हमने बनकर माली बड़ी तकलीफ हुई उस वक्त जब �
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बेरोजगार-बेरोजगार हू, साहब
ना मूझे दौलत पयारी ना सौरत पयरी है। बेरोजगार हू, साहब मुझे नौकरी पयारी है।
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पहले जो था खुमार ओ खुमार आती नहीं है।
पहले जो था खुमार ओ खुमार आती नहीं है। बूढ़े दरख्त पर फिर से बहार आती नहीं है। पहले बुलबुले चहचाहती थी जिस साख पर। उस साख पर फिर
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चांदनी रात -गज़ल
खाली दिल यार है मेरा क्यों जज्बात बने? चांदनी रात में आ जाएं तो कुछ बात बने। छुप के मिला करते हैं अच्छा नहीं लगता। भरे बज्म में आ जाए �
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