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ग़ज़ल
अहले हुस्न देकर खुद को कँगाल कर बैठे
अहले हुस्न देकर खुद को कँगाल कर बैठे मुझ गरीब का इतना क्यों ख़याल कर बैठे। ऐसी वैसी तो कोई बात भी नहीं थी खांमखां तिरी बातों का मलाल क
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इक दौर ऐसा आएगा कुछ ही साल भर में
इक दौर ऐसा आएगा कुछ ही साल भर में पत्थर मिलेंगे जालिम शीशागरों के घर में। जल्दी मिलेगी तुमको मंजिल सुनो तुम्हारी तुम मुश्किलें हो ज�
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जो इश्क के दरिया में कभी पार नहीं होते
जो इश्क के दरिया में कभी पार नहीं होते वो लोग मुहब्बत के हकदार नहीं होते। उनसे भी कभी पूछो ये जिंदगी क्या चीज है बो जिनके कहीं कोई घर ब
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हैरान था मैं आपको हैरान देखकर
हैरान था मैं आपको हैरान देखकर ऐसे तुम्हारे हुस्न का ऐलान देखकर। जब इश्क तोलने को तुम्हारा कहा गया मैंने नजर ही मोड़ ली मीजान देखकर।
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बिन बाती के दीपक जलाया नही जाता
भूल से वो हमसे भुलाया नही जाता दिल में लिखा फिर मिटाया नहीं जाता ।। तुम आओ तो रोशन हो सकता हु में बिन बाती के दीपक जलाया नही जाता ।। द�
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जो लोग मिरे नाम से महबूब रहे हैं
जो लोग मिरे नाम से महबूब रहे हैं वो हल्का ए आगोश में तो खूब रहे हैं। कुछ ना मिला तो उसने मिरा नाम लिखा है खाली न कभी हाथ के मकतूब रहे हैं
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कुछ इस तरह से अबकी सताया गया मुझे
कुछ इस तरह से अबकी सताया गया मुझे हँसने लगा तो फिर से रुलाया गया मुझे। हर शख्स जिंदा देखके हैरान था यहां कल फिर से खलबतों में बुलाया ग�
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इन मयकदों काअबकी सारा हिसाब कर दे
इन मयकदों काअबकी सारा हिसाब कर दे मेरे लहू की बूंदों को ही शराब कर दे। जालिम न चल कमर को अपनी दिखादिखा के ऐसा न हो ये मेरी नीयत खराब कर �
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कोई तो याद मेरी कहानी रखे
कोई तो याद मेरी कहानी रखे बेवजह अपनी आंखों मे पानी रखे। रब्त है जब उसे हर नई चीज से सांस क्यों फिर बदन में पुरानी रखे। क्यों न हो हादस
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आज फिर किसी से कोई बवाल कर बैठे
आज फिर किसी से कोई बवाल कर बैठे सर ए राह मोहब्बत का सवाल कर बैठे। कांच का बदन उसका कांच की कमर उसकी और कांच की तशरीफ है सँभाल कर बैठे। �
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जिन हसीनो के यां नखरे उठाए जाते हैं
जिन हसीनो के यां नखरे उठाए जाते हैं उनकी आंख से खंजर भी चलाए जाते हैं। वागवान ए गुल के मुंह से सुना हमने हर निगाह में उनकी फूल पाए जात�
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कोई फकीर फुकरा बताया गया मुझे
कोई फकीर फुकरा बताया गया मुझे मेरे ही घर मे पूछ के लाया गया मुझे। पहले कहा सभी ने जरा हंस दीजिए जो हंसने लगा तो रुलाया गया मुझे। हां इ
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