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गीत
एक खुशबू फैल रही है हवाओं में
तू गुजरी है इन राहों से शायद, एक खुशबू फैल रही है हवाओं में। तूने लहराई है जुल्फें शायद, एक नशा फैल रहा है फिजाओं में।। तूने खनकाई है
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प्यार असली या नकली-गूंजता है एक सवाल हरदम
चले गए बुझा के नजरों से चाहत का चिराग, कर गए रुसवाई की बरसात, धधकती रही आग। छोड़ गए हमको तड़पने के खातिर इस कब्र में, उम्मीद का दामन ना
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मां से ही ज्योति-करो प्रेम की वृष्टि
माँ तेरे उपकार से, जीवन में है प्यार। महिमा तेरी खूब है,जाने सब संसार।। माँ तेरे उपकार से,ज्योति युक्त है सृष्टि। रहे धरा गुलजार नित,�
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दुनिया विराजमान मां तेरे उपकार से
माँ तेरे उपकार से, जीवन में है प्यार। महिमा तेरी खूब है,जाने सब संसार।। माँ तेरे उपकार से,ज्योति युक्त है सृष्टि। रहे धरा गुलजार नित,�
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पुष्प भरे हैं प्यार-निभा रही किरदार
चिड़िया बैठी डाल पर, पवन बहे हैं मस्त। सभी जीव आनंद में,सबका दुख है अस्त।। चड़िया बैठी डाल पर, पुष्प भरे हैं प्यार। नव चाहत मन में लिए,�
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झाँझर मेरा दिल हुआ-संकट सब ही पार
भोली सूरत देखकर,मचल गया मैं यार। झाँझर मेरा दिल हुआ,संकट सब ही पार।। भोली सूरत देखकर,अंजुमन में हर्ष। निकला जो उदगार तब,हुए सभी आकर्ष
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जीवन सरगम सा रहे,मिले दिव्य पहचान
मानवता का मोल है,कहे उसे इंसान। जीवन सरगम सा रहे,मिले दिव्य पहचान।। मानवता का मोल है, यही जगत आधार। रौनक मय जन जन लगे,रहे सरस व्यवहार।�
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लगा रखें हैं खोल-कितने घातक हो गए
दुविधा में रहते सभी, करते रहते मोल। कितने घातक हो गए,लगा रखें हैं खोल।। लगा रखें हैं खोल,बने फिरते हैं नेता। करते हैं गुमराह,भाग लोगों
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मन की उमीदें-आंखों में आंसू ना आए
दिन ढलते ही मन की उम्मीदें भी! पता नहीं कहां छुप जाती हैं! शायद मन को बहलाने का! आंखों में आंसू ना आए ! इसको छिपाने का प्रयत्न करने लगती
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उलझन-मन में कितनी उलझन है
न जाने !मन में कितनी उलझन है! इन उलझनों को सुलझाने का! कोई एक रास्ता तो दो! कहनी है बहुत कुछ तुमसे ! कभी मेरी भी बातों को सुनने को एक शाम त�
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बस उड़ने के लिए नीला आसमान ढुढती हूं
कोरे है कागज मेरे ,स्याही की कमी है क्या लिखूं, शब्द ही नहीं है कितनी अजीब है ये जिंदगानी देखो पढ़ो क्या कहता है इन नयनों का पानी यूं
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झुलस रहा है आदमी-महँगाई की आग
झुलस रहा है आदमी, छलियों का है राज। वादा झटपट तोड़ते, समझे खुद को बाज।। झुलस रहा है आदमी,मिलता है प्रतिघात। मन जाता है टूट तब,करते सभ्य
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