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कविताएँ
इस प्रेम पर है मोह पहरा-हर नाज़ुक इंसान यहां पर है ठहरा
इस प्रेम पर है मोह पहरा , हर नाज़ुक इंसान यहां पर है ठहरा।।१।। जितना किया इसे कम उतना, हों गया यह गहरा ।।२।। जो �
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दरिद्रता- सुबह सबेरे तड़तड़ाहट की आवाज कानों में पड़ते ही
दरिद्रता " सुबह सबेरे तड़तड़ाहट की आवाज कानों में पड़ते ही नीद टूटी,मैं जाग पड़ा, देखा कि लोग सूप पीट पीट कर दरिद्र" भगा रहे थे घर के
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जिंदगी भर का जख्म दे दिया तूने-हमने तो कुछ पल की खुशी मांगी थी
जिंदगी भर का जख्म दे दिया तूने हमने तो कुछ पल की खुशी मांगी थी तूने तो कांटा बिछा डाला राहों में मेरे सीने से दिल निकालकर पत्थर का ब�
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अगर मैं तेरी होती-तो कदर ना मेरी होती
अगर मैं तेरी होती तो कदर ना मेरी होती जमाने का है ऐ दस्तूर कड़वा है मगर सच है जरूर तुझको लगती हूं मैं प्यारी क्योंकि मैं हूं चीज पराई
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करते नहीं विचार जो-करते कुछ भी काम
#विधा:-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" करते नहीं विचार जो,करते कुछ भी काम। आये जब परिणाम तो,लगता उसे लगाम।। करते नहीं विचार जो,औ
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छठ माई की शाम पर-सजा हुआ है घाट
#विधा:-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" छठ माई की शाम पर,सजा हुआ है घाट। पूजा पूजा मय हुआ,अनुपम है नव ठाट।। छठ माई की शाम है,आज सुह�
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उजला तन किस काम का-काला जब हो सोच
#विधा:-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" उजला तन किस काम का,काला जब हो सोच। ऐसे जन सब ही यहाँ,करते रहते नोच।। उजला तन किस काम का,जिसक
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करते नहीं विचार जो-उसे बुद्धि है भ्रष्ट
#विधा:-मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" करते नहीं विचार जो,उसे बुद्धि है भ्रष्ट। उल्टे सीधे काम से,करे प्रगति को नष्ट। और गँवा�
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करते नहीं विचार जो-रहे सदा बेरंग
#विधा:-दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" करते नहीं विचार जो,करते कुछ भी काम। आये जब परिणाम तो,लगता उसे लगाम।। करते नहीं विचार जो,औ
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क्या कहूं आज मैं आप से- डरता मैं हूं बहुत पाप से
क्या कहूं आज मैं आप से। डरता मैं हूं बहुत पाप से। मैं प्यार का एक मस्त राही- डरूं नहीं कद की नाप से । (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिं�
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दुनिया रंग बिरंगी-इन रंगों के बाजार में कई रंग के होते हैं लोग
दुनिया है रंग बिरंगी इन रंगों के बाजार में कई रंग के होते हैं लोग ! मैंने देखा है !एक नहीं कई रंग बदल लेते हैं लोग! न जाने कैसे ? मैंने दे
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जब से मैंने तुझको जाना है
जब से मैंने तुझको जाना है। दिल तुझको अपना माना है। आँखों में जो न समाये - प्यार का तूँ अनमोल खजाना है। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुम
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