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पहेला प्यार कविता
याद है वो दिन, जब था मेरा पहला प्यार। थी मुस्कान उसकी, खुशियों का इज़हार। दिल में उमंग थी, दिल्लगी भी थी, चाहत का रंग जब चढ़ गया था। मिल�
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आते हैं विचार
आते हैं विचार जब सोना था तब हो न सके अब भी जाग रहे बिना आधार आते हैं विचार। कौन रहा अब पथ का साथी बीत गयी जब सुख की बाती, निर्णय का वह क
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हैप्पी फादर्स डे परी आपकी आपको कहती हैं
आया दिन खुशियों का कितनी मस्ती है झूम रही हूं मैं झूमती पुरी बस्ती हैं पापा मेरे वो हस्ती है सामने जिनके दुनिया की हर चीज सस्ती है है�
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मगर सिखाने वाला पिता ही होता है
।। कविता ।। दुनिया में कहने वाले हजार मिलते हैं मगर सिखाने वाला पिता ही होता है सब एक समय तक साथ छोड़ जाते हैं मगर अंत तक पिता ही साथ
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पिता वो साया है।
पिता वो साया है सर पर जिसके रहते दुखो की बूंद भी हमे छू नही पाती है फिर चाहे वो खुद कितनी दुखो की बारिश झेल कर आता हो। पिता वो सहारा है
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बच्चों की तरह
रूठते थे हम भी कभी बच्चों की तरह ! अपनी चोटी को ठीक से बनाने की जिद करते थे हम भी कभी। हंसते थे कभी खिलखिला कर। राह पर यूं ही । रहते थे मस�
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हर वक्त आगे को चलता रहा
वक्त हर वक्त आगे को चलता रहा दरिया सागर की ओर बहता रहा है सफर है अलौकिक चलती है सृष्टि दिन -रात का सिलसिला बदलता रहा है मगर एक तू है सद�
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कायनात में तुझ सा नहीं कोई हसीन
कायनात में तुझ सा नहीं कोई हसीन, न ही है कोई तुमसे बढ़कर रंगीन। काली जुल्फों में हो तुम एक हीर, बड़े_बड़े दीवानों के लिए हो जंजीर। चमन
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बर्दाश्त नहीं पहरा मेरी नजाकत पर
अपनों का ख्याल रखते रखते अपना ख्याल रखना भूल गई पता नहीं क्यों अपनों के लिए ही मैं इतनी फिजूल हुई अब तो मेरे अपने ही मुझे पागल कहते ह�
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जिन्दगी जीया जाता है-आशा के दीप से
आशा के दीप से ही तो जिन्दगी जीया जाता है, यूं निराश_हताश होकर तो कुछ फायदा ही नहीं। दुनिया आशा और विश्वास पर टिका हुआ है, नहीं तो फिर मान
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जीवन एक चक्र समान ही है,
जीवन एक चक्र समान ही है, सतत यह प्रक्रिया जारी रहता है। जन्म_मृत्यु का का खेल, निरन्तर जारी रहता है। यहां सब एक _दूसरे पर आश्रित हैं, �
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सर्वप्रथम रोटी आवश्यक है
सर्वप्रथम तो रोटी ही आवश्यक है, उसके बाद कपड़ा और मकान। विकास कि ऊंची उड़ान तो हम भरें हैं, लेकिन भूख की तड़प अभी भी यहां है। शिक्षा क
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