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कविताएँ
जैसे कि तुम मुहाज़िर हो कोई
वो तुम्हें धितकारते हैं ऐसे जैसे कि तुम काफिर हो कोई जैसे ये वतन तुम्हारा ना हो जैसे कि तुम मुहाज़िर हो कोई उन्हें नफरत है तुम्हारे र
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इस दिवाली
इस दिवाली प्रण करें, नमन करें, मन का दीप ज्वलंत करें। सफाई और सादगी, दो दृढ़ हत्यार से, जीवन का सुरक्षा करें। तन सुरक्षित_मन सुरक्षित �
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बस रहे मेरे
था मैं एक चित्र अधूरा मेरा तस्कार तू कोरा था ये जीवन मेरा इस पे लिखा किताब तू प्रेम की देवी प्यार की मूर्त प्रेम के जीवित मात्र प्र�
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मूलतत्व
काल रूपी सयम से बक्त भी लाचार है समय के इस चक्र से हर कोई अंजान है जिस दिन बदल गया माहाकाल के स्थिरता चारो ओर विनाश होगा बस बचेंगा
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बंचित
प्रेम; मुहब्बत; आशिकी; चाहत; अनुराग, इश्क़, हुस्न,जवानी या फिर उफनती क्यारी क्या कहु प्यार की मूर्त अनुराग स्नेह, भक्ति, लगाव या फिर म�
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रंग बदलती
इस रंग बदलती दुनिया को कई रंग बदलते देखा है कही तस्वीर तो तस्वीरों में ढलते देखा है कभी मंदिर तो कभी मस्जिद तो कभी टुटते तारो के आ�
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अभिलाषा
अभिलाषा थी एक दिन तुझे पा सकू पर एशा हो न सका कुछ लम्होने भी संजोये थे यादें कुछ इकठा हमने भी किए थे सासें समय के तराजू प्यार के मोल थ
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आंख न लग पाए
प्रियतम के विरह में, आंख न लग पाए जब मेरे नयनजल शेय्या पर टपकत जाए है अपने हृदय बूझना न पाऊं प्रियतम के विरह में आंख न लग पाए सांझ सबेर�
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दो लफ्ज़
तेरे लिए जब भी बोलूं, मेरे लफ्ज़ कम पड़ जाते हैं बस इतना बोलूं तुझमें में देंखु, तुम मुझमें देखो। करू खुदा से इक मिन्नत जब भी आए तेरे दर
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//... पैगाम-ए-दिवाली...//
//... पैगाम-ए-दिवाली...// मत हो परेशान तू , जिंदगी एक काम है...! मुश्किलों से लड़ना सीख , जिंदगी एक मुकाम है...! किस घड़ी यह कैसी होगी , इससे सब अ�
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घर ही पे
बहुत अच्छे वक्त गुजारे है ज़िन्दगी के ज़रा रुक जाई ठहर जाई ऐ घर ही पे ये भी दुख के बादल छट जायेंगे सभी के फिर निकलेंगे धुम से शहर घुमन
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टनकार
काल है डरा रहा मौत के टनकार से चल सको तो चलो अंधकार मे है जग सारा चल सको तो चलो आशमा वरसा रहा अंगार के बौछार है चल सको तो चलो काल है ड
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