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ग़ज़ल – ए – गुमनाम-डॉ सचिदानंद चौधरी

                 ग़ज़ल-14

कुछ हँसाकर हमें बहुत रुलाने वाले
बहुत रोयेंगे सुन तेरे हर चाहने वाले

ये रंग-ए-हिना है या खून-ए-दिल
क्या है हाथ में मेंहदी रचाने वाले

अब तो पता भी पूछना ठीक नहीं
शक़ से देखते हैं पता बताने वाले

कब्रगाह में भी होने लगी है हलचल
ज़द में आ गये कयामत ढ़ाने वाले

हद से गुज़र कर दर्द बन जाता है दवा
मुस्काते रहना हद से गुज़र जाने वाले

गुमसुम रहता है ‘शशि’ क्यूँ आसमाँ में
शोर मचाते हैं ख़ुद ही कुछ चुराने वाले

लेखक-डाo सच्चितानन्द चौधरी ‘शशि’

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