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सत्ता नहीं, व्यवस्था बदलने की जरूरत::-वीरेंद्र देवांगना

सत्ता नहीं, व्यवस्था बदलने की जरूरत::
कोरोना कहर के बीच बिहार चुनाव के तारीखों का एलान चुनाव आयोग के द्वारा किया जा चुका है। तीन चरणों में मतदान होगा। 28 अक्टूबर, तीन नवंबर और 7 नवंबर। 10 नवंबर को नतीजे आ जाएंगे कि बिहार में किसकी सरकार बनेगी? नीतीश कुमार वापसी करेंगे या कोई और कुमार सत्तासीन होगा। इसपर इलेक्ट्रानिक मीडिया में बहस अपने शबाब पर है।
पूर्व में कर्नाटक के धमासान और 3 राज्यों के 4 लोकसभा व 9 राज्यों के 10 विधानसभा उपचुनाव के ताजा नतीजों के उपरांत इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया में यह बहस और सर्वे बढ़-चढ़कर दिखाया और छापा जा रहा है कि 2019 का सरताज कौन? किसके सर पर ताज होगा और कौन होगा बेताज?
क्या मोदी की राह में कांटे बोएगा तृणमूल या हाथी कुचलेगा कमल का फूल? चर्चाओं का यह दौर राज्य सरकारों खासकर-राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव के संबंध में भी जोर-शोर से जारी था।
यह चर्चा गली-मोहल्ले, चैक-चैबारों, नुक्कड़ों-चैपालों में भी आम था। गरमागरम बहस घर-परिवार और पास-पड़ोस में भी हो रहा था। रिश्तेदार खेमों में बंटे हुए थे और अपनी समझ के मुताबिक पक्ष-पार्टी की सरकार बनने-बनाने की पुरजोर दलीलें पेश कर रहे थे।
गोया सरकार बनने-बिगड़ने से उनका कोई भला होनेवाला है। व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन होनेवाला है। भ्रष्टाचार का खात्मा होकर भ्रष्टाचारी जेल में जानेवाले हैं। शासकीय धन का दुरूपयोग थमनेवाला है। सत्तासीन दलों के कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी और दादागिरी थमनेवाली है। गरीबों की गरीबी दूर होनेवाली है। किसानों की समस्याओं का अंत होकर आत्महत्याएं थमनेवाली है। किसानों व आमजनों के बच्चों की बेरोजगारी दूर होनेवाली है। महंगाई से निजात मिलनेवाली है।
मानो बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या और जानलेवा गरीबी को रोकने के लिए कोई ठोस व कठोर नीति बननेवाली है। पेट्रोल-डीजल के दाम में कोई रियायत मिलनेवाली है। उन्हें अस्पतालों में डाक्टर और इलाज की बेहतर सुविधा मिलनेवाली है। उनके बच्चों को स्कूलों, कालेजों में बिना धक्के खाए एडमिशन मिलनेवाला है। सरकारी कार्यालयों में तमाम रिक्त पदों पर भर्तियां होकर आमजनों की त्वरित सुनवाई होनेवाली है।
जैसे उनकी पुलिस थानों में बिना किसी भेदभाव और लिएदिए काम होनेवाला है। सड़कों पर रेलपेल और दुर्धटनाएं कम होनेवाली है। टेªनों की लेटलतीफी थमकर तमाम परेशानियों से मुक्ति मिलनेवाली है। अपराधियों से नेताओं का सांठगांठ रुकनेवाला है। बलात्कार और महिला अपराध थमकर उन्हें निष्कंटक काम करने के लिए किसी समय आनेजाने की आजादी मिलनेवाली है। वृद्धों को बगैर लेटलतीफी और धुमाव-फिराव के पेंशन मिलनेवाला है।
गोया पर्यावरण प्रदूषण के रोकथाम के लिए भेदभाव के बिना सख्त कार्रवाई की जानेवाली है। अतिक्रमण करवाने का गोरखधंधा बंद होनेवाला है। नदियों और तालाबों को प्रदूषणमुक्त किया जानेवाला है। उग्रवाद, नक्सलवाद, आतंकवाद और अलगाववाद लगाम लगनेवाला है। राजनीतिक दल चंदे के पैसे के पाई-पाई का हिसाब देनेवाले हैं।
आशय यह कि चोर-चोर मौसेरे भाई सरीखे शातिर भाइयों की अब नही चलनेवाली है। गोया कायदे-कानून के राज के पालना से जनमन के अच्छे दिन आनेवाले हैं।
इसके उलट कटु सत्य यह कि सरकारें बदलने से व्यवस्थाएं नहीं बदलती। वह जस-की-तस बनी रहती हैं। बस, नेताओं के चेहरे बदल जाते हैं, एक पार्टी से दूसरी पार्टी गद्दी हथिया लेती है, जो जनता को मुंह चिढ़ाते हुए अपना उल्लू सीधा करती रहती है।
जनजनार्दन व्यवस्था के हाथों घुटती-पीसती और मरती-खपती रहती है। यह कटु सत्य एक नहीं, अनेक मर्तबा प्रमाणित हो चुका है। लोग अपनी परेशानी से निजात पाने के लिए सत्ता में बदलाव करने के लिए वोट करते हैं, लेकिन राजनीतिक दल सत्ता मिलने के बाद उन्हें ही चोट करती हैं, जिनके वोट से सत्ता शिखर तक पहुंचा करते हैं।
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विशेष टीपःः वीरेंद्र देवांगन की ई-रचनाओं का अध्ययन करने के लिए google crome से जाकर amazom.com/Virendra Dewangan में देखा जा सकता है।

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