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कहानी

डॉ राजेंद्र यादव आजाद 23 Sep 2026 कहानियाँ प्यार-महोब्बत कहानी 1041 0 Hindi :: हिंदी

लहरों में दबा सच
अलवर की सुबह धीरे-धीरे अपने रंग में उतर रही थी। अरावली की पहाड़ियों के पीछे से सूरज की पहली किरणें निकलकर शहर की पुरानी इमारतों, संकरी गलियों और रेलवे स्टेशन की पटरियों पर बिखर रही थीं। स्टेशन पर चाय की भाप के साथ यात्रियों की आवाजें घुल रही थीं। कोई अपने गंतव्य की जल्दी में था, कोई किसी को विदा कर रहा था और कोई अपने भविष्य की तलाश में शहर में कदम रख रहा था। उसी भीड़ में एक दुबला-पतला युवक अपना पुराना बैग कंधे पर टांगे खड़ा था—देवेंद्र। गांव की मिट्टी उसके जूतों से चिपकी हुई थी, लेकिन आंखों में शहर से भी बड़ा सपना था। उसके पिता चाहते थे कि उनका बेटा शिक्षक बने। उनका मानना था कि खेती और गांव की जिंदगी के बीच पला-बढ़ा बच्चा अगर शिक्षा के क्षेत्र में जाएगा तो वह अपने परिवार का भविष्य बदलेगा और साथ ही अनेक बच्चों का जीवन भी बदल सकेगा। “बेटा,” पिता अक्सर कहते, “नौकरी अपने उदर की पूर्ति  के लिए मत करना। ऐसा काम करना जिससे किसी दूसरे का जीवन बेहतर हो।” देवेंद्र पिता की बातें चुपचाप सुनता था। उसे लगता था कि वह सचमुच शिक्षक बनेगा। गांव के बच्चों को पढ़ाएगा। जिन बच्चों के पास अच्छी किताबें नहीं हैं, उन्हें किताबें देगा। जिनके घरों में पढ़ाई का माहौल नहीं है, उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिखाएगा। लेकिन जिंदगी हमेशा मनुष्य की योजनाओं के अनुसार नहीं चलती। अलवर में एक छोटे से किराए के कमरे में रहकर उसने शिक्षक भर्ती परीक्षा की तैयारी शुरू की। सुबह जल्दी उठना, चाय बनाना, किताबें लेकर पुस्तकालय जाना और देर शाम कमरे में लौटकर फिर पढ़ना—उसकी जिंदगी इसी चक्र में घूमने लगी। कई बार वह रात को किताब बंद करके छत की ओर देखता और खुद से पूछता—“क्या मैं सफल हो पाऊंगा?” फिर पिता का चेहरा उसकी आंखों के सामने आ जाता। वह दोबारा किताब खोल देता। लेकिन परीक्षा दर परीक्षा निकलती गई और चयन नहीं हुआ। एक दिन जब वह गांव लौटा तो पिता ने उसके चेहरे की उदासी पढ़ ली। “क्या हुआ?” देवेंद्र ने सिर झुका लिया। “इस बार भी नहीं हुआ।” पिता कुछ देर शांत रहे। फिर बोले, “एक परीक्षा में असफल होने से जिंदगी असफल नहीं होती।” देवेंद्र ने पूछा, “लेकिन कब तक?” पिता मुस्कुराए। “जब तक सांस है, तब तक कोशिश।” वह पिता की बात अपने भीतर रखकर फिर अलवर लौट आया। लेकिन नियति को शायद उससे कोई दूसरा काम करवाना था। कुछ समय बाद उसके पिता की कैंसर से मौत हो गई । पिता की मृत्यु ने देवेंद्र की जिंदगी से जैसे एक पूरा आकाश छीन लिया। अब घर में मां , भाई और भाभी थी और मां की आंखों में बेटे के लिए उम्मीद। एक शाम मां ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—“बेटा, नौकरी देर से मिले तो कोई बात नहीं। मेहनत मत छोड़ना।” देवेंद्र मुस्कुराया। “अम्मा, एक दिन ऐसा काम करूंगा कि आपको मुझ पर गर्व होगा।” मां ने पूछा, “क्या करेगा?” देवेंद्र ने मजाक में कहा, “अभी नहीं बताऊंगा।” मां हंस पड़ी। उसे क्या पता था कि उसका बेटा एक दिन ऐसा काम करेगा, जिसके कारण उसका नाम तो अमर होगा, लेकिन मां की गोद हमेशा के लिए सूनी हो जाएगी। शिक्षक बनने का सपना अधूरा रह गया तो देवेंद्र ने एक दैनिक समाचार पत्र में नौकरी के लिए आवेदन किया। अखबार के संपादक राजेश ने उसका इंटरव्यू लिया। राजेश अनुभवी पत्रकार था। उसने वर्षों तक खबरों के पीछे छिपे सच को देखा था। उसे मालूम था कि पत्रकारिता चमकदार पेशा है जिसमें हर युवा आना चाहता है, लेकिन पत्रकारिता सवालों से भरी हुई  कठिन राह है। उसने देवेंद्र से पूछा—“पत्रकार क्यों बनना चाहते हो?” देवेंद्र ने बिना सोचे कहा—“लोगों की आवाज बनना चाहता हूं।” राजेश ने उसे ध्यान से देखा। “लोगों की आवाज बनना आसान नहीं है।” “मैं कोशिश करूंगा।” राजेश हल्का-सा मुस्कुराया। “पत्रकारिता में कोशिश नहीं, जुनून चाहिए।” देवेंद्र ने कहा—“जुनून भी है।” राजेश ने पूछा—“अगर तुम्हारी खबर से किसी ताकतवर आदमी को परेशानी हो गई तो?” देवेंद्र कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला—“अगर खबर सच होगी तो परेशानी खबर में नहीं, उस सच्चाई में होगी जिसे छिपाया जा रहा है।” राजेश ने पहली बार मुस्कुराकर उसकी ओर हाथ बढ़ाया। “कल से आ जाना।” इस तरह देवेंद्र पत्रकार बन गया। शुरुआत में उसे छोटी खबरें मिलती थीं। सड़क टूटी है। अस्पताल में डॉक्टर नहीं है। स्कूल में शिक्षक कम हैं। किसान को मुआवजा नहीं मिला। गरीब की जमीन पर कब्जा हो गया। दूसरे पत्रकार इन खबरों को खबर की तरह देखते थे, लेकिन देवेंद्र उनके पीछे छिपे आदमी को देखता था। किसी अस्पताल की खबर उसके लिए अस्पताल की अव्यवस्था नहीं थी। वह सोचता—इसका असर उस मरीज पर क्या होगा जिसके पास इलाज के लिए पैसे नहीं हैं? किसी स्कूल में शिक्षक की कमी की खबर लिखते हुए वह सोचता—उन बच्चों का भविष्य क्या होगा? धीरे-धीरे उसकी पहचान बनने लगी। “वह देवेंद्र है।” “जो सवाल पूछता है?” “हां।” “किसी से डरता नहीं?” “शायद नहीं।” राजेश उसे हमेशा एक बात समझाता—“तथ्य मजबूत रखो। भाषा संयमित रखो। पत्रकार का सबसे बड़ा हथियार प्रमाण होता है।” देवेंद्र ने यह बात अपने भीतर उतार ली। एक रात अखबार का काम खत्म करके देवेंद्र अपने कमरे की ओर लौट रहा था। शहर के एक पुराने भवन के पीछे उसे कुछ युवाओं की गतिविधि दिखाई दी। पहले उसने ध्यान नहीं दिया। फिर उसकी नजर एक युवक पर पड़ी जो लगभग बेहोशी की हालत में जमीन पर पड़ा था। कुछ दूसरे युवकों के हाथों में गोलियां, इंजेक्शन और छोटी-छोटी पुड़ियां थीं देवेंद्र रुक गया। उसने दूर से कुछ तस्वीरें खींच लीं। अगली सुबह उसने राजेश से कहा—“सर, मुझे लगता है मामला बड़ा है।” राजेश ने पूछा—“कितना बड़ा?” “अभी नहीं जानता। लेकिन कुछ युवाओं को नशे की तरफ धकेला जा रहा है।” राजेश ने कहा—“फिर खबर मत लिखो। पहले  गहराई से जांच करो और सबूत जुटाओ।” देवेंद्र निकल पड़ा। कई दिनों तक उसने अलग-अलग इलाकों में घूमकर जानकारी जुटाई। कॉलेजों के आसपास गया। हॉस्टलों के पास गया। सुनसान जगहों पर गया। युवाओं से बात की। दुकानदारों से पूछा। पुलिस रिकॉर्ड देखने की कोशिश की। धीरे-धीरे उसे पता चला कि यह कुछ युवाओं का नशे का नेटवर्क नहीं था बल्कि यह एक ऐसा नेटवर्क था जिसमें सफेद पोश राजनेता और पुलिस की वर्दी भी शामिल थी । एक ऐसा नेटवर्क जिसमें छोटे विक्रेताओं से लेकर बड़े संपर्कों तक कई कड़ियां थीं और इसी जांच के दौरान एक नाम बार-बार उसके सामने आने लगा—राजू। राजू स्वयं निर्वाचित जनप्रतिनिधि नहीं था, लेकिन उसकी पत्नी विधायक थी। राजनीतिक गलियारों में उसका प्रभाव माना जाता था। वह सामने कम आता था, लेकिन उसके संपर्क बहुत दूर तक फैले हुए थे। राजू के साथ अक्सर दिखाई देने वाला व्यक्ति था—जितेंद्र। जितेंद्र उसका सहयोगी था। वह राजू के कई कामों में संपर्क सूत्र की भूमिका निभाता था। शहर के युवाओं, व्यापारियों और प्रभावशाली लोगों के बीच उसकी आवाजाही थी। देवेंद्र को शुरू में राजू या जितेंद्र का नशे के कारोबार से कोई सीधा संबंध नहीं मिला। यही कारण था कि उसने जल्दबाजी नहीं की। उसने अपनी डायरी में लिखा—“किसी व्यक्ति का किसी जगह दिखाई देना अपराध में भागीदारी का प्रमाण नहीं है। संदेह और प्रमाण के बीच बहुत लंबी दूरी होती है।” वह दूरी वह तय करना चाहता था। एक दिन जितेंद्र को पता चला कि एक पत्रकार उसके बारे में सवाल पूछ रहा है। उसने राजू को बताया। “नाम?” “देवेंद्र।” “कहां का है?” “अखबार में नया है।” “कितना अंदर गया?” जितेंद्र ने कहा—“उम्मीद से ज्यादा।” राजू कुछ देर चुप रहा। फिर बोला—“पहले समझाओ।” “और अगर नहीं समझा?” राजू ने उसकी ओर देखा। “हर समस्या का जवाब ताकत नहीं होता।” जितेंद्र समझ गया। इसके बाद देवेंद्र को महसूस होने लगा कि कोई उसका पीछा कर रहा है। एक मोटरसाइकिल कई दिनों तक उसके पीछे दिखाई देती। कभी अखबार के बाहर। कभी उसके कमरे के पास। कभी पुस्तकालय के सामने। एक दिन उसने मोटरसाइकिल का नंबर लिख लिया। फिर उसकी नजर दूर खड़े जितेंद्र पर पड़ी। दोनों की आंखें मिलीं। जितेंद्र मुस्कुराया। फिर वहां से चला गया। देवेंद्र के शरीर में एक ठंडी लहर दौड़ गई। अब मामला  खबर का नहीं था। उसने राजेश को सब बताया। राजेश ने कहा—“सावधान रहो।” “सर, क्या मुझे जांच छोड़ देनी चाहिए?” “नहीं।” “फिर?” “जांच करो। लेकिन हर कदम सोचकर।” देवेंद्र ने पूछा—“ क्या डरते  हो सर ?” राजेश ने कहा—“डरना कमजोरी नहीं है। डर के बावजूद सही काम करना साहस है और तुम सहासी हो ।” देवेंद्र की जांच आगे बढ़ी। कुछ दस्तावेज मिले। कुछ फोन नंबर मिले। कुछ यात्राओं के रिकॉर्ड मिले। कुछ ऐसे नाम मिले जो अलग-अलग जगहों पर दिखाई दे रहे थे। जितेंद्र का नाम बार-बार सामने आने लगा। राजू का नाम प्रत्यक्ष रूप से कम था, लेकिन संपर्कों की कुछ कड़ियां उसके प्रभाव क्षेत्र तक जाती थीं। देवेंद्र ने रिपोर्ट तैयार की। लेकिन उसने किसी को अपराधी घोषित नहीं किया। उसने लिखा—“उपलब्ध दस्तावेज और संपर्क इस नेटवर्क की संभावित संरचना की ओर संकेत करते हैं। संबंधित लोगों की भूमिका की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।” राजेश ने खबर पढ़ी। कुछ देर तक चुप रहा। फिर बोला—“यही पत्रकारिता है।” रिपोर्ट प्रकाशित हुई। शहर में हलचल मच गई। पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया। पूछताछ हुई। कुछ ठिकानों पर कार्रवाई हुई। लेकिन इस कार्रवाई का असर नशे के कारोबार तक सीमित नहीं रहा। नशे के धंधे में लिफ्ट लोगों  को पहली बार महसूस हुआ कि देवेंद्र बहुत करीब पहुंच गया है। उस रात राजू और जितेंद्र के बीच बातचीत हुई। “अब यह आदमी रुकने वाला नहीं है।” जितेंद्र ने कहा—“तो रोकना पड़ेगा।” राजू ने चिलाकर कहाँ —“गलती मत करना।” “ क्योंकि ” “एक पत्रकार पर हाथ उठाना पूरे मामले को बड़ा कर देगा।” जितेंद्र कुछ देर चुप रहा। फिर बोला—“तो उसे शहर से दूर रखना होगा।” धमकियां शुरू हो गईं। पहले फोन आए। फिर अनजान संदेश। फिर किसी ने कहा—“बहुत ज्यादा सवाल मत पूछा करो।” देवेंद्र ने जवाब नहीं दिया। लेकिन मां को किसी तरह पता चल गया। उसने फोन किया। “बेटा, छोड़ दे यह सब।” “क्या?” “जो कर रहा है।” “अम्मा, मैं गलत क्या कर रहा हूं?” “मुझे नहीं पता। मुझे बस डर लगता है।” देवेंद्र चुप रहा। मां रोते हुए बोली—“मुझे दुनिया नहीं चाहिए बेटा। मुझे बस मेरा बेटा चाहिए।” देवेंद्र की आंखें भर आईं। “मैं सावधान रहूंगा।” “वादा?” “वादा।” लेकिन कुछ वादे जिंदगी से पुरे नहीं होते। राजेश ने कुछ दिनों की छुट्टी लेने की सलाह दी। देवेंद्र ने सोचा—कुछ दिन शहर से बाहर चला जाता हूं। उसने गोवा जाने का फैसला किया। फोन पर मां से कहा—“अम्मा, मैं गोवा जा रहा हूं।” “इतनी दूर?” “समुद्र देखने।” “अकेले?” “हां।” “जल्दी लौटना।” देवेंद्र हंसा। “लौटकर समुद्र से हुई बातें सुनाऊंगा।” मां ने कहा—“मैं इंतजार करूंगी।” उधर किसी और जगह दो लोग गोवा जाने की तैयारी कर रहे थे। राजू और जितेंद्र। गोवा पहुंचते ही देवेंद्र को समुद्र की विशालता ने कुछ देर के लिए सब कुछ भुला दिया। लहरें किनारे से टकरातीं और वापस लौट जातीं। वह देर तक समुद्र को देखता रहा। उसने सोचा—“कितना अजीब है यह समुद्र। कितनी चीजें अपने भीतर समेट लेता है।” लेकिन उसे नहीं मालूम था कि कुछ ही घंटों बाद वही समुद्र उसकी जिंदगी का आखिरी गवाह बनने वाला है। होटल की लॉबी में उसे जितेंद्र दिखाई दिया। देवेंद्र कुछ क्षण के लिए ठिठक गया। “तुम?” जितेंद्र मुस्कुराया। “दुनिया छोटी है।” देवेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया। अगले दिन समुद्र किनारे उसे राजू भी दिखाई दिया। अब कोई संयोग नहीं था। उसने दूर से दोनों की तस्वीरें खींचीं। राजेश को भेजीं। संदेश लिखा—“सर, ये लोग मेरे पीछे गोवा तक आए हैं।” राजेश का जवाब तुरंत आया—“अकेले मत मिलना। होटल बदलो। सारी सामग्री सुरक्षित जगह भेजो।” देवेंद्र ने लिखा—“ठीक है।” लेकिन वह अपने कदम बदल पाता, उससे पहले जितेंद्र उसके सामने आ गया। “आपको पता है कि आप किसके पीछे पड़े हैं?” देवेंद्र ने कहा—“मैं किसी व्यक्ति के पीछे नहीं हूं।” “फिर?” “सच के पीछे हूं।” जितेंद्र ने धीमे स्वर में कहा—“हर सच प्रकाशित नहीं किया जाता।” देवेंद्र मुस्कुराया। “और हर राज हमेशा छिपा नहीं रहता।” जितेंद्र की आंखों में कुछ पल के लिए कठोरता आई। फिर वह चला गया। उस रात होटल के कमरे में राजू और जितेंद्र बैठे थे। बाहर समुद्र की आवाज आ रही थी। राजू ने पूछा—“क्या मिला उससे?” जितेंद्र ने कहा—“कुछ दस्तावेज हैं।” “कहां हैं?” “पता नहीं।” “फोन?” “संभव है उसने कहीं भेज दिए हों।” राजू कुछ देर खिड़की से बाहर देखता रहा। फिर बोला—“जो करना है, ऐसा करो कि मामला हमारे ऊपर न आए।” जितेंद्र ने उसकी ओर देखा। कमरे में कुछ क्षण सन्नाटा रहा। रात गहरी हो चुकी थी। देवेंद्र समुद्र किनारे गया। उसके पास खबर से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण सामग्री थी। वह उसे सुरक्षित स्थान पर भेजने की तैयारी कर रहा था। उसने मोबाइल निकाला। एक संदेश टाइप किया। फिर पीछे कदमों की आहट सुनाई दी। वह मुड़ा। कुछ लोग खड़े थे। दूर राजू दिखाई दिया। उसके पास जितेंद्र था। देवेंद्र ने कहा—“आप दोनों यहां भी आ गए?” जितेंद्र आगे बढ़ा। “तुम्हें बहुत दूर तक जाने से पहले रुक जाना चाहिए था।” देवेंद्र ने कहा—“मैंने अभी कुछ लिखा ही नहीं है।” “तो डर किस बात का है?” राजू आगे आया। “कभी-कभी सवाल ही बहुत खतरनाक होते हैं।” देवेंद्र ने मोबाइल उठाया। “तो फिर जवाब देना शुरू कर दीजिए।” कुछ क्षणों तक सब शांत रहा। फिर धक्का-मुक्की शुरू हुई। देवेंद्र ने खुद को बचाने की कोशिश की। मोबाइल उसके हाथ से छूटकर समुद्री रेत पर गिरा। वह पीछे हटता गया। पीछे समुद्र था। आगे कुछ चेहरे। उसने आखिरी बार राजू और जितेंद्र की ओर देखा। उसके चेहरे पर भय से ज्यादा सवाल था। “क्या सच इतना खतरनाक हो सकता है?” एक धक्का। एक चीख। और अगले ही क्षण देवेंद्र समुद्र की लहरों में समा गया। उसकी आवाज लहरों में दब गई। समुद्र फिर शांत हो गया। मानो उसने कुछ देखा ही न हो। कुछ घंटों बाद उसका शव मिला। अलवर में खबर पहुंची। अखबार के दफ्तर में सन्नाटा छा गया। राजेश देवेंद्र की मेज के पास जाकर खड़ा हो गया। मेज पर वही नोटबुक थी। एक कैमरा था। कुछ कागज थे। और एक अधूरी खबर। राजेश ने फाइल खोली। उसमें किसी को अपराधी घोषित नहीं किया गया था। सिर्फ सवाल थे। तथ्य थे। संपर्क थे। तारीखें थीं। और आखिरी पन्ने पर देवेंद्र ने लिखा था—“सच्चाई तक पहुंचने के लिए जल्दबाजी नहीं, धैर्य चाहिए।” राजेश की आंखें नम हो गईं। उसने फाइल बंद की। फिर कहा—“तुम्हारी खबर यहां खत्म नहीं होगी।” जब पुलिस देवेंद्र के घर पहुंची तो उसकी मां दरवाजे पर खड़ी थी। पुलिस वालों के चेहरे देखकर उसके हाथ कांपने लगे। उसने पूछा—“मेरा देवेंद्र?” कोई जवाब नहीं दे पाया। मां समझ गई। उसने चौखट पकड़ ली। “नहीं…” वह धीरे से जमीन पर बैठ गई। कुछ देर बाद उसने केवल इतना कहा—“उसने कहा था समुद्र की बातें सुनाएगा।” फिर वह रो पड़ी। “बिना बातें सुनाए कैसे चला गया?” अंतिम संस्कार के समय उसने पति की पुरानी तस्वीर देवेंद्र की अर्थी के पास रख दी। “अब तुम दोनों साथ रहना,” उसने कहा, “मैं यहां अकेली रह लूंगी।” देवेंद्र की मौत के बाद राजेश ने उसकी पूरी खबर को व्यवस्थित किया। हर दस्तावेज की स्वतंत्र पुष्टि कराई गई। हर नाम को दोबारा जांचा गया। हर संपर्क को सत्यापित करने की कोशिश हुई। राजेश का आदेश था—“हम देवेंद्र के नाम पर किसी निर्दोष को दोषी नहीं बनाएंगे।” उसने कहा—“देवेंद्र की मौत हमें भावुक कर सकती है, लेकिन पत्रकारिता को भावुक नहीं होना चाहिए।” जांच आगे बढ़ी। नशे के नेटवर्क की कई कड़ियां सामने आईं। राजू और जितेंद्र से जुड़े संपर्कों की जानकारी भी जांच एजेंसियों को उपलब्ध कराई गई। लेकिन अखबार ने वही लिखा जिसकी पुष्टि हो सकती थी क्योंकि देवेंद्र का सिद्धांत स्पष्ट था—“संदेह को खबर बनाया जा सकता है, लेकिन संदेह को सच बताना पत्रकारिता नहीं है।” समय बीतता गया। लेकिन देवेंद्र की मां ने उसका कमरा बंद नहीं किया। उसकी किताबें वहीं थीं। उसकी नोटबुक वहीं थी। उसका कैमरा वहीं था। उसकी कलम भी वहीं थी। एक दिन गांव के लोगों ने तय किया कि गांव के स्कूल में देवेंद्र के नाम से पुस्तकालय बनाया जाएगा। उद्घाटन के दिन मां ने देवेंद्र की तस्वीर के सामने दीप जलाया। उसकी आंखों में आंसू थे लेकिन आवाज में गर्व था। “मेरा बेटा शिक्षक बनना चाहता था।” वह कुछ क्षण रुकी। “वह शिक्षक नहीं बन पाया।” फिर उसने पुस्तकालय की किताबों की ओर देखा “लेकिन अब उसकी किताबें बच्चों को पढ़ाएंगी।” उसने देवेंद्र की कलम मेज पर रख दी। “अब यह मेरी नहीं है। जिस बच्चे को इसकी जरूरत हो, वह उठा ले।” एक बच्चा आगे आया। उसने कलम को देखा। फिर पूछा—“दादी, मैं बड़ा होकर पत्रकार बन सकता हूं?” मां ने उसके सिर पर हाथ रखा। “बनना बेटा।” “लेकिन?” “सच को समझे बिना मत लिखना।” बच्चे ने सिर हिलाया। मां ने कहा—“और किसी निर्दोष को अपनी खबर का शिकार मत बनाना।” कुछ दिनों बाद राजेश पुस्तकालय आया। वह देवेंद्र की तस्वीर के सामने खड़ा रहा। काफी देर तक कुछ नहीं बोला। फिर धीरे से कहा—“तुम्हारी फाइल अभी बंद नहीं हुई है।” पीछे से मां की आवाज आई—“फाइल बंद हो या न हो…” राजेश ने उसकी ओर देखा। मां बोली—“मेरे बेटे का सपना बंद मत होने देना।” राजेश की आंखें झुक गईं। “नहीं मां।” वह बस इतना ही कह पाया। शाम हो चुकी थी। पुस्तकालय की खिड़की से बच्चों की आवाजें बाहर आ रही थीं। कोई किताब पढ़ रहा था। कोई कहानी सुना रहा था। कोई देवेंद्र की तस्वीर के सामने खड़ा होकर उसकीखबरो के बारे में पूछ रहा था। राजेश बाहर निकलते हुए एक बार फिर पीछे मुड़ा। दीवार पर देवेंद्र की तस्वीर थी। नीचे उसकी कलम रखी थी। वह कलम अब एक मृत पत्रकार की निशानी नहीं थी। वह आने वाली पीढ़ी के हाथों में जाने वाला एक सवाल थी। एक ऐसा सवाल जिसका उत्तर शायद किसी एक अदालत, किसी एक जांच या किसी एक अखबार में नहीं मिलेगा। समुद्र की लहरें आती हैं। किनारे से टकराती हैं। और लौट जाती हैं। लेकिन कुछ आवाजें लौटकर नहीं आतीं। वे लहरों में घुल जाती हैं। देवेंद्र की आवाज भी शायद उसी समुद्र में कहीं दब गई थी। लेकिन उसका सवाल आज भी जिंदा था—क्या सच लिखने की सजा मौत है? और अगर किसी पत्रकार की कलम को समुद्र की लहरों में डुबो दिया जाए, तो क्या सच भी डूब जाता है? नहीं। सच कभी पूरी तरह नहीं डूबता। वह कभी किसी अधूरी खबर में बचा रहता है। कभी किसी पुराने मोबाइल कैमरे में। कभी किसी मां की आंखों में। कभी किसी बच्चे के हाथ में उठी कलम में। और कभी समुद्र की उन बेचैन लहरों में, जो बार-बार किनारे से टकराकर जैसे कहती हैं—“देवेंद्र चला गया, लेकिन सवाल अभी बाकी है।” गोवा का समुद्र आज भी अपनी लहरों के शोर में जैसे एक अनसुनी गवाही दोहराता है। अलवर की मिट्टी आज भी उस युवक को याद करती है जिसने शिक्षक बनने का सपना देखा था, लेकिन पत्रकार बनकर समाज के सामने सवाल खड़े कर गया। उसकी मां आज भी शायद दरवाजे की ओर देखती होगी उसे अब भी लगता होगा कि बेटा किसी दिन अचानक आएगा और हंसते हुए कहेगा—“अम्मा, समुद्र बहुत बड़ा है।” और मां शायद तब भी वही पूछेगी—“समुद्र की बातें सुनाने में इतनी देर क्यों लगा दी?” लेकिन देवेंद्र अब कभी नहीं आएगा। उसकी जगह उसकी किताबें आएंगी। उसकी जगह उसके सवाल आएंगे। उसकी जगह उसकी कलम बोलेगी। और शायद यही किसी पत्रकार की सबसे बड़ी विरासत होती है—उसकी आवाज बंद की जा सकती है, लेकिन उसके सवालों को हमेशा के लिए खत्म नहीं किया जा सकता फिर कोई युवा गांव की गलियों से निकालकर शहर में पत्रकार बनकर देवेंद्र के सवालों को दोहराएगा!! डॉ. राजेंद्र यादव ‘आजाद’ — मोबाइल: 9414271288

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