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कुर्सी

Dr.sandeep kumar 27 Jun 2026 कहानियाँ राजनितिक #kursi#vyang#Rajnretiparvyang 660 0 Hindi :: हिंदी

दुनिया की अधिकतर लड़ाइयों का एक ही कारण है - कुर्सी। राजा-महाराजाओं की जंग हो या आज के नेता का ट्वीट वार, मंज़िल सबकी एक ही है: वो गद्दी। ताज बदले, सिंहासन बदला, पर लड़ाई वही रही। यथा राजा तथा प्रजा, जिस देश में नेता जैसे होते हैं ,उस देश में जनता भी वैसी ही हो जाती है। जनता भी भला कुर्सी की दौड़ में कहां पीछे रहने वाली है। वह बात बात पर सारे स्थान पर कुर्सी ढूंँढ ही लेती है। अगर आप किसी चाय की दुकान पर हैं तो सबसे पहले आप कुर्सी ही ढूंँढेंगे, किसी ऑफिस में अधिकारी से मिलने गए हैं, तब आप कुर्सी ढूंँढेंगे, यह अलग बात है कि वह आपको बैठने कहे या ना कहे।स्कूल, कॉलेज ,किसी समारोह या दावत में गए हैं, तब आप कुर्सी ढूंँढेंगे, बस में चढ़ गए हैं तो सबसे पहले आप कुर्सी ही ढूंढेंगे, यहां तक कि बस में कई बार कुर्सी उपलब्ध न होने पर आप बस तक ड्रॉप कर देते हैं। और तब सोचिए उन स्थानों पर कुर्सी न मिलने पर आपको कितनी हताशा का सामना करना पड़ता है। तब बेचारे जो नेता तन -मन -धन लगाकर एक कुर्सी की जुगत में अपना सब कुछ बलिदान कर देते हैं और फिर कुर्सी हार जाते हैं, उनकी हालत का जरा अंदाजा तो लगाइए। मेरे देखें पूरा भारतवर्ष कुर्सी पर ही टिका है। 
फिर कुर्सियाँ भी अलग-अलग प्रकार की होती हैं। सारी कुर्सियां एक- सी नहीं होतीं,कुर्सियों का स्थान भी उनकी ऊंचाई तय करता है यह ऐसे भी कह सकते हैं कुर्सियों की ऊंचाई भी उनका स्थान तय करती है। कुछ कुर्सियां प्रथम पंक्ति में पड़ी होती हैं, तो उनका मूल्य कुछ और होता है जबकि वही कुर्सियां द्वितीय, तृतीय पंक्ति में पड़ी होती हैं तो उनका मूल्य उसी हिसाब से कम हो जाता है। कुछ कुर्सियांँ सोफे का रूप ले लेती है पर होती मूलतः कुर्सियां ही हैं। किसी संस्था का अध्यक्ष बनना है, किसी संस्थान का प्रमुख बनना है, किसी राजनीतिक पार्टी में कोई बड़ा पद लेना है, सब का मूल्य अलग-अलग है। आपको जितनी बड़ी कुर्सी चाहिए ;उतना ही बड़ा मूल्य चुकाना पड़ेगा। और कुर्सी न मिलने पर कुर्सियों से ही जो घमासान होता है ,उसका तो कहना ही क्या। कई बार तो बिना बात के ही बीच में कुर्सी आ जाती हैं। भारत के संसद भवन में कुर्सियों की महाभारत तो हम सब देखते ही रहते हैं । 

पहले लकड़ी की कुर्सियां होती थी, अब प्लास्टिक की कुर्सी हैं। राजा महाराजाओं की सोने की कुर्सियां होती थी, आजकल लोहे की भी होती हैं । हैं तो सब कुर्सियांँ ही। कोई मेहमान यदि आपके घर आता है और आप उसको कुर्सी पर बैठने के लिए न कहें तो वह बुरा मान जाता है। कुर्सी उपलब्ध न हो तो आपको कुर्सी का स्थान छोड़ देना होता है। यदि किसी संभ्रांत व्यक्ति के आने पर कुर्सी उपलब्ध न हो और कुछ लोग बैठे हों तो उनमें से वह व्यक्ति कुर्सी छोड़ता है ,जो सबसे छोटा होता है । कई बार उम्र में और कई बार पद में। इसे सामाजिक औपचारिकता भी माना जाता है और न छोड़ने पर धृष्टता भी। 
बस में सबकी कुर्सियां अलग-अलग होती हैं।परिचालक की ,विधायक की, मान्यता प्राप्त पत्रकार की। कभी-कभी ऐसी स्थिति भी पैदा हो जाती है कि उक्त व्यक्ति के आने पर आपको कुर्सी छोड़नी पड़ती है। पर भारत में अमूमन ऐसा नहीं देखा जाता क्योंकि भारत के विधायक , सांसद,मान्यता प्राप्त पत्रकार ,बस जैसी मामूली सवारी में सफल नहीं करते। उनके पास तो अपनी गाड़ियां हैं और अपनी कुर्सियांँ हैं । यह सस्ती छोटी कुर्सियांँ उन्होंने जनता के लिए छोड़ रखीं हैं। भारत में तो जनता भी इस कदर है कि हर कुर्सी कम पड़ जाती है और फिर नौबत हाथापाई तक की आ जाती है। कभी बस में तीन की सीट पर दो सवारी और एक अपने 8 साल के बेटे को को बिठाकर यदि आप बैठ जाएं। तो कंडक्टर की दृष्टि आपके तरफ ही रहती है कि मैं कैसे यहां एक सवारी और एडजस्ट कर सकूं। इस तरह से कई यात्रियों की बेचारे कंडक्टर से झडप भी होती रहती है और यह आम दृश्य हैं। हर व्यक्ति आराम पसंद जिंदगी जीना चाहता है ,इसलिए उसके मन में कुर्सी की चाह पैदा होती है। और ऐसा नहीं है कि केवल राजनीतिक लोगों में ही कुर्सी की लड़ाइयां होती हैं मठाधीशों धार्मिक गुरु में तो यह लड़ाई राजनीति से भी कहीं ज्यादा बड़ी है। वह कुर्सी के लिए बड़े-बड़े कांड हो जाते हैं। मठाधीश अपने आपको किसी न्यायाधीश से काम नहीं समझता। कितने मठाधीशों ने कुर्सी पाने की खातिर अपने गुरु को स्वर्ग का रास्ता दिखा दिया। और कितने इसके लिए तैयार बैठे हैं। इंसान स्वर्ग क्यों माँगता है? वहाँ भी कुर्सी जो मिलती है। रूप बदल जाता है - कभी मठ की गद्दी, कभी चबूतरे का आसन, कभी श्मशान का टीला। नाम बदल जाता है - पद, ओहदा, रुतबा। पर चीज़ वही रहती है। मरते दम तक आदमी यही हिसाब लगाता है: ऊपर वाली कुर्सी पक्की है या वहां भी खड़े रहना पड़ेगा?

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