Dharmpal Saroj 25 Aug 2026 कहानियाँ समाजिक हिंदी कहानी, गांव की हिंदी कहानी, ग्रामीण जीवन, किसान, किसान कहानी, नदी का किनारा, गेहूंफसल, धान कीफसल, गन्ने कीखेती, 510 0 Hindi :: हिंदी
नदी किनारे बसा वह गाँव नदी के किनारे बसा वह छोटा-सा गाँव दूर से देखने पर किसी चित्र की तरह लगता था। सुबह होते ही नदी के पानी पर सूरज की सुनहरी किरणें पड़तीं और ऐसा लगता, जैसे किसी ने पानी के ऊपर सोना बिखेर दिया हो। नदी के एक तरफ गाँव के कच्चे-पक्के घर थे और दूसरी तरफ दूर-दूर तक फैले खेत। सर्दियों के मौसम में गेहूँ की हरी फसल हवा के साथ लहराती तो पूरा खेत समुद्र जैसा दिखाई देता। कहीं धान की फसल की खुशबू मिट्टी में घुली रहती, कहीं मक्के के लंबे पौधे आसमान की तरफ सिर उठाए खड़े रहते। गाँव के किसानों के लिए यही खेत उनकी जिंदगी थे। गाँव के बाहर एक पुराना आमों का बाग था। गर्मियों में जब आम पकने लगते तो पूरा वातावरण मीठी खुशबू से भर जाता। बच्चे पेड़ों के नीचे खेलते और बुजुर्ग वहीं चारपाई डालकर बैठ जाते। उसी गाँव में रामदीन नाम का एक किसान रहता था। उसके पास बहुत बड़ी जमीन नहीं थी, लेकिन वह अपनी थोड़ी-सी जमीन को ही अपनी सबसे बड़ी दौलत मानता था। रामदीन सुबह सूरज निकलने से पहले उठ जाता। सबसे पहले नदी के किनारे जाकर कुछ देर बैठता और फिर खेतों की तरफ निकल जाता। उसकी पत्नी सीता अक्सर कहती, “इतनी सुबह खेत में जाकर क्या करते हो? सूरज तो निकलने दो।” रामदीन मुस्कुराकर जवाब देता, “खेत भी तो हमारा इंतजार करते हैं सीता। किसान अगर देर से उठेगा तो फसल किससे बात करेगी?” सीता हँस देती। रामदीन के खेत में उस साल गेहूँ की फसल बहुत अच्छी थी। दूसरे खेत में धान की फसल तैयार हो रही थी। खेत के एक हिस्से में उसने मक्का बो रखा था और पशुओं के लिए चरी भी उगा रखी थी। बाजरे की फसल भी हवा में झूम रही थी। एक दिन अचानक गाँव में खबर फैली कि नदी का पानी तेजी से बढ़ रहा है। गाँव के लोग घबरा गए। नदी उस गाँव के लिए जीवन भी थी और कभी-कभी डर का कारण भी बन जाती थी। रामदीन नदी के किनारे पहुँचा। पानी सामान्य से काफी ऊपर आ चुका था। उसने दूर खेतों की तरफ देखा। उसकी आँखों के सामने गेहूँ की लहराती फसल, धान के खेत, मक्के के पौधे और बाजरे की बालियाँ घूमने लगीं। उसने गहरी साँस ली। “हे भगवान, किसानों की मेहनत बचा लेना।” रात होते-होते बारिश तेज हो गई। गाँव के कई लोग अपने खेतों की ओर जाने लगे, लेकिन बुजुर्गों ने उन्हें रोक दिया। “अभी बाहर मत जाओ। पानी बढ़ रहा है।” रामदीन भी घर लौट आया। उस रात किसी की आँखों में नींद नहीं थी। सुबह जब बारिश रुकी तो गाँव वालों ने देखा कि नदी का पानी कुछ कम हो गया था। सबसे पहले रामदीन अपने खेत की ओर दौड़ा। गेहूँ की फसल कुछ जगह झुक गई थी, लेकिन पूरी तरह नष्ट नहीं हुई थी। धान के खेत में भी पानी था, मगर पौधे खड़े थे। मक्के की फसल को भी ज्यादा नुकसान नहीं हुआ था। रामदीन ने राहत की साँस ली। तभी उसे नदी के किनारे एक छोटा-सा पौधा दिखाई दिया। वह आम का पौधा था। शायद नदी के बहाव के साथ कहीं से बहकर आया था और मिट्टी में आकर टिक गया था। रामदीन ने उसे उठाया और अपने आमों के बाग के पास लगा दिया। उसका बेटा मोहन पास खड़ा देख रहा था। मोहन ने पूछा, “बाबा, यह पौधा बड़ा होकर क्या देगा?” रामदीन ने मुस्कुराकर कहा, “आम।” “और अगर हम यहाँ नहीं रहे तो?” रामदीन कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “तो कोई और इसकी छाँव में बैठेगा।” मोहन अपने पिता की तरफ देखने लगा। रामदीन ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “बेटा, किसान केवल अपने लिए नहीं बोता। वह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बोता है।” समय बीतता गया। गेहूँ की फसल कट गई। धान घरों में पहुँच गया। मक्के की बालियाँ भी भरने लगीं। चरी ने पशुओं का पेट भरा और बाजरे की फसल ने घर के चूल्हे तक अपना रास्ता बना लिया। और वह छोटा-सा आम का पौधा भी धीरे-धीरे बढ़ने लगा। कई साल बाद वह पौधा एक बड़ा पेड़ बन गया। एक गर्मी की दोपहर मोहन, जो अब बड़ा हो चुका था, उसी पेड़ के नीचे बैठा था। उसके बच्चे आम खा रहे थे। मोहन ने पेड़ की तरफ देखा तो उसे अपने पिता की बात याद आ गई— “किसान केवल अपने लिए नहीं बोता।” उसने पेड़ की छाँव में बैठे अपने बच्चों को देखा और मुस्कुरा दिया। दूर नदी आज भी बह रही थी। किनारे पर गेहूँ के खेत हवा में लहरा रहे थे। कहीं धान की हरियाली थी, कहीं मक्का आसमान को छूने की कोशिश कर रहा था। चरी और बाजरे के खेत गाँव के पशुओं और लोगों की जरूरत पूरी कर रहे थे। और आमों के बाग में पक्षियों की आवाजें गूँज रही थीं। मोहन ने नदी की तरफ देखते हुए धीरे से कहा, “यह गाँव सिर्फ मिट्टी से नहीं बना है। यह उन लोगों की मेहनत से बना है, जिन्होंने अपनी जिंदगी खेतों में बो दी और आने वाली पीढ़ियों के लिए खुशियाँ उगा दीं।” नदी बहती रही। खेत लहराते रहे। आमों के पेड़ फलते रहे। और उस छोटे-से गाँव की कहानी भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही।