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हे भाषा तुम वो हिंदी हो

शरद भूषण मोंगरा 14 Sep 2026 कविताएँ देश-प्रेम हिंदी अपेक्षा 1841 0 Hindi :: हिंदी

" हे भाषा ",          
 हे  भाषा  तुम वो हिंदी  हो .........
हिंद देश की भाषा  बनकर,गूँज रही जो युगों युगों से
जिसमे सुगंध  है संस्क्रती की,प्रेम माधुर्य भरे स्वरों से
एक सूत्र  में सबको  बांधे ,तुम ही तो वह  संस्क्रत   हो
सप्त सिन्धु की  सिन्धी थी जो,हप्त हिन्दू की हिंदी थी जो
संस्क्रत थी  जिसकी जननी,  हिंद देश की वो हिंदी हो
हे भाषा तुम  वो हिंदी हो ......................
गूँज रही जो सुमनों में,देशो में  दिशा दिशांतर में,
हे हिंदी तुम वो खुशबू हो,कालों और कालांतर में,
साधू संत फकीरों ने  भी,स्वछ  भाव से तुम्हे उचारा
ब्रहमज्ञान  भी तुमसे मिलता,जग ने तुमको श्रेष्ट पुकारा  हिन्दू की अति प्रिय  हो तुम, हिन्दुस्तान की बोली हो तुम
मानव तुम पर मुग्ध हुवे,अति सीधी  निर्मल भोली हो तुम
ममता प्रेम  और दान दया ये,सब हिंदी के रूप निराले
हिंदी  के एक - एक अक्षर  में, होते हैं अमृत के प्याले
ब्रज की भाषा बनकर चमकी,अवध की भाषा बनकर चमकी
सोने की चिड़िया की खनक तुम,से सात समंदर पार भी खनकी
दिल को दिलसे जोड़ रही हो,तन को मन से जोड़ रही हो  
रिस्तो का आधार है हिंदी,  मानव  के जज्बात हैं  हिंदीलाज शर्म और श्रंगार में, बस्ती है नारी के हिंदी 
रीत रिवाज  और परिधानों से, झलक रही जो वो है हिंदी
मधुर तान है मधुर गान है, मर्दंगो  की ताल है हिंदी
आनंद रस छंदों की तरंग,और भावों का हर हाल है हिन्दी
मात्रभाषा भी हिंदी है और राष्ट्र प्रेम भी अपना हिंदी
और शब्द पे लगकर अर्थ जो बदले,हिंदी की ऐसी है बिंदी
भारत की पहचान है हिंदी,भारत का अभीमान है हिंदी
भारत का विज्ञान है हिंदी,भारत का भगवन है हिंदी 
दूर देश भी चकित हुए हैं, तुझे सुने ना थकित हुए हैं
उत्सुक भाव से सीख  रहे हैं, तेरे पथ के पथिक हुए हैं
सरल सहजता से संवरी हो, ज्ञान की गंगा में निखरी हो 
हिन्दुस्तान का परचम जग में,फहराने को अब निकली हो
इंदु देश की तुम इंदी हो,हे भाषा तुम वो हिंदी हो                                            
शरद भूषण मोंगरा
कवि गीतकार

इस कविता को एक सुंद

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