Anilkumar Rathwa (Sameer) 04 Feb 2026 कविताएँ समाजिक "ज्ञान-पात्र" 12155 0 Hindi :: हिंदी
पत्थर की मूरत को छप्पन भोग लगाते हो, सोने के गुंबद पर तुम चांदी चढ़ाते हो। वो तो जगत का स्वामी है, उसे क्या कमी है? असली जरूरत तो यहाँ, आँखों में नमी है। वो दान पेटी अब स्कूलों में होनी चाहिए, किताबों की कमी अब दूर होनी चाहिए। दुआ कुबूल होगी, जब कोई बच्चा पढ़ेगा, अंधेरे घर का दीपक, जब ज्ञान से जलेगा। मंदिर की घंटियों से सुंदर, उस बस्ते की खनक है, मस्जिद की पाक आयतों सी, नन्हे माथे की चमक है। ईश्वर भी खुश होगा देख कर ये मंजर, जब कलम थामेगा वो हाथ, जो था बेघर। पुण्य की असली राह, भूखे को रोटी और प्यासे को पानी है, पर सबसे बड़ा दान, जो बदल दे किसी की ज़िंदगानी है। मजहब का सच्चा अर्थ, बस इंसानियत में ढाल दो, सिक्का मंदिर में नहीं, किसी बस्ते में डाल दो।