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नौकरी की तलाश

Nisha Kumari 07 Oct 2026 कविताएँ समाजिक परीक्षा और निराशा 3835 0 Hindi :: हिंदी

पढ़ते पढ़ते आधी उमर बीत गई
फिर भी हुआ नहीं कुछ खास
मन में है बस नौकरी की आस
अपनी पहचान की तलाश।।
 
बहुत परीक्षाएँ भी दे चुके
सफलता फिर भी हाथ न आयी 
निरंतर प्रयास भी किया 
उम्मीदें ने फिर साथ छोड़ दिया।।

फिर भी कही अब भी लगता है 
एक और प्रयास भी कर लेते हैं
आशा बस यही कि अब तो कुछ अच्छा हो 
किस्मत अब तो साथ दे देगी।।

धांधलियों ने फिर अपना विश्वास तोड़ा 
नाकामी से हमारा रिश्ता जोड़ा
थक जाते है जब दिल और दिमाग
अपने भी छोड़ देते है साथ।।

काश एक दिन वो भी आता
सर गर्व से हमारा भी उठ जाता 
करते माता पिता भी हम बच्चों पर नाज़
मिल जाता हमे भी अपना मकाम।।

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