नितिश सरोज पाण्डेय 11 Feb 2025 कविताएँ समाजिक 22128 0 Hindi :: हिंदी
"मुल्क का खूँ बहाकर क्या पाओगे हुजरे की राख से क्या लाओगे लड़ाते हो इंसा को तुम इंसा से बड़े बदनसीब हो जाने कब समझ पाओगे कुनबे औरों के साथ तुम्हारे भी हैं ज़द में दिन तो बीत ही जायेगा, शाम बिताने कहाँ जाओगे?" क्या है तुम्हारी रंजिश का अस्बाब जरा बताओ तो ढूंढते हो महफिले-गैर को जो, क्या करोगे जब ढूंढ लाओगे बिठा रखा है सारे वतन को मकतल के कफ़स में न खेलो आतिश-ए-आफताब से यूँ बेखबर होकर, जल जाओगे