Rajnish khandal 28 Mar 2025 कविताएँ हास्य-व्यंग rana sanga 43181 0 Hindi :: हिंदी
ना जाने इनके विचार कहा है ???
ये गद्दार है और खुद गवाह है।
ये रूपो में छिपे भेरुपिए है,
जो दिखावे का देश चलाते है।
ये मानसिंह जैसे गद्दार है,
जो खुद की संस्कृति पर कलंक लगाते है।
अरे ! जिसने हम सब के लिए लड़ते - लड़ते प्राण दिये।
संस्कृति अपनी बची रहे इस विचार से, शीष रण चण्डी को चढ़ा दिये।
जिस स्वाभिमान की रक्षा की खातिर, वीरांगनाओ ने जोहर किये, जिसने आज ये कलंकीत बाते सुनने, शीष तलवारो से कटा दिये।
आज रो रहा होगा वो योद्धा जिसने असहनीय पिडा़ए गले लगाई थी, हिंदू विरोध करने वाली उस, संस्कृति को धूल चटाई थी।
खुन से अपना इतिहास लिखा था, हाथ कटा पर प्राण बचा था।
पीछे चलने वाले बहुत मिलते पर उसने आगे बढ़कर विचार रचा था।
भाई मरे, बेटे मरे, संबंधी मरे पर सबको हंसते - हंसते विदा किया।
पर आज मेरे उस राजा को उसकी गद्दी धारक ने रुला दिया।
आज रो रहे होंगे सब योद्धा, जिन्होने हमको गौरवशाली जीवन दिया, अपना छोटा सा स्वार्थ साधने संसद में गद्दार उन्हें बता दिया।
~रजनीश खाण्डल