नितिश सरोज पाण्डेय 11 Feb 2025 कविताएँ समाजिक 20595 0 Hindi :: हिंदी
पुराने शहर के चौक पर आकर रुक गया हूँ उस पपीहे की आवाज सुनने की कोशिश कर रहा जो मेरे तुम्हे बुलाने की आवाज में सुर मिलाता था वो बूढ़ी दादी मरजीना दिखाई नहीं पड़ती अब और ना ही उनकी वो रहस्यमयी मुस्कराहट ही दिखती है जो हम दोनों को साथ देख कर ऐसे बिखरती थी फिजाओं में जैसे उनके दिनों की याद हममे समायी हो सुबह सुबह चौक पर चाय बेचने वाले कासिम मियाँ तो तुम्हे याद ही होंगे बहुत कड़क चाय की प्याली पिलाया करते थे महसूस तो यूं होता था जैसे सारे शरीर में ताजगी सी फ़ैल गयी हो अब न जाने किस शहर में बस गए हैं वो तुम्हारी गली में बेर बेचने वाली शगुफ्ता चाची की टोकरी भी अब कहीं दिखाई नहीं दे रही है और साथ ही साथ असलम, मिर्जा, हाकिम और अनवर की दुकानें और ठेले भी न जाने कहाँ गायब हो गए हैं नहर के पास के बरगद के पेड़ के नीचे बैठ कर बात करने वाले लोग भी अब कम ही नजर आते हैं शाम टहलने निकला शहर में तो लगा जैसे अपने ही शहर में अजनबी सा हो गया हूँ बरसों बात लौटा हूँ शहर में ऐसा लग रहा है जैसे शहर "हिन्दू" हो गया है।