Anilkumar Rathwa (Sameer) 12 Feb 2026 कविताएँ समाजिक "सोने की सलाखें" 12069 0 Hindi :: हिंदी
वो कहते हैं चमक देखो, दीवारों का निखार देखो, इन सोने की सलाखों में, तुम शाही ठाठ-बाट देखो। हर दाना है मोती जैसा, हर बर्तन है चांदी का, पर मोल यहाँ कोई नहीं, बस पंखों की पाबंदी का। खुला आसमान पुकार रहा, जहाँ बादलों की बस्ती है, वहाँ धूप भी अपनी है, और अपनी ही मस्ती है। भले यहाँ की छतें सुनहरी, पर छिन गई परवाज़ मेरी, इस कैद में घुटकर रह गई, अब चहकने की आवाज़ मेरी। ना चाहिए ये महल की रौनक, ना झूठा सम्मान मिले, बस दो गज की टहनी हो, और सर को पूरा आसमान मिले। क्योंकि सोने की ये दीवारें, रूह को बस तड़पाती हैं, आज़ादी की एक सांस, सौ जन्नत से बढ़कर होती है।