Kishor Kumar Bhardwaj 26 May 2026 कविताएँ अन्य हौसले 2626 0 Hindi :: हिंदी
थक गया हूँ सफ़र में मगर रुकना नहीं सीखा, इन बुझते हुए ख़्वाबों को फिर से मचलने दो। रात ने छीन ली है चमक मेरी निगाहों की, सुबह बनकर उभरूँगा, बस सूरज निकलने दो।। लौट कर आऊंगा शाखाओं पर हरियाली लेकर, पतझड़ की जद में हूँ, ज़रा मौसम बदलने दो.. जो बिखर गए हैं रास्तों में, उन्हें फिर से समेट लूँ, ज़िंदगी की धूप को थोड़ा और पिघलने दो।। अभी ख़ामोश हूँ तो ये मत समझना हार गया, वक़्त की तह में हूँ, मुझे फिर से निकलने दो।। ✍️के.भारद्वाज