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कलयुग
इस कलयुग में लोग खुद को सुखी को लेकर खुश नही बल्कि दूसरे की खुशी को देखकर दुखी है
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ज़ख़्म को आने दो
नए उस ज़ख़्म को आने दो, वो मेरा दिवाना है उसे मेरे पुराने ज़ख़्म पर मरहम लगाना है।। ये टुकड़े देख कर जानाँ , न उलझो तुम सवालों में मेरी तस्�
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कविता, - बेटी के विदाई।
बेटी इतना क्यो रो रही हो। मेरे दिल का दर्द बडा़ रही हो। खुशी से शादी करके तु । अपने ससुराल ही तो जा रही हो। अपने का साथ छोड कर। मोह माय
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कविता - झुम के आया सावन।
सुंदर सावन आया। मेरे मन को भाया। सखी तु कर ले श्रृंगार। झुला झुली आम के डाल। काले बादल छाये। रिमझिम वर्षा आया। बिजली चमके आसमान। �
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सर झुका जाते हैं
कुछ सपने बंद से नहीं खुली आंखों से भी देख लिए जाते हैं, सुख नयनों में बेसुमार अश्क भर लिए जाते हैं, पुष्प माली के समक्ष अदब से सर झुका जा
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मेरे देश मे! प्यार बढ़ जाये
निकल जाये ! निकल जाये निकल जाये! मेरे देश से ! धर्म भेद निकल जाये मेरे देश मे ! प्यार ही बढ जाये अब छोड बी दो ! ये सब नाराजीया आओ सबी भाई ब�
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मैंने क्या बिगड़ा था
मैंने क्या बिगड़ा था जो मुझे इस नज़रिए से देखा जाता है मैंने क्या बिगड़ा था क्या ये गलती है मेरी की मै एक गरीब हूं तो क्या मेरी कोई ए
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// ...दे लात... //
छत्तीसगढ़ में तनख्वाह निकालने के एवज में बकरा भात की मांग और अनुकंपा नियुक्ति में रिश्वतखोरी घटना पर मेरी एक छोटी सी सम-सामयिक रचना.....
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ज़िन्दगी कहां है तू
ज़िन्दगी कहां है तू ढूंढू तुझे हर जगह कभी सपनों में तो कभी ख्वाबों में ज़िन्दगी कहां है तू जिस जिंदगी की हम तलाश में है जिस जिंदगी �
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चलो लम्हे चुराते है
चलो लम्हे चुराते है जो रेत सी हाथों से फिसलती जा रही आज उसको कैद करते है चलो लम्हे चुराते है थोड़ा सा लम्हे को जी लेते है उनसे कुछ ख्व�
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मैं फिलीस्तीन हूँ सियासत मे जलता हूँ
जालिमों की हिरासत मे जलता हूँ अपने घर,अपनी रियासत मे जलता हूँ तुम मुझे पहचानते हो ऐ दुनियाँ जहाँ वालो मैं फिलीस्तीन हूँ सियासत मे जल�
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बातों ही बातों मे बात कजा हो जाऐगी
बातों ही बातों मे बात कजा हो जाएगी नींद मारी जाएगी रात कजा हो जाएगी ये कैसा धरम है ये कैसे लोग हैं जिनकी अछूतों के छूने से जात कजा हो ज�
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