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पर तुम्हारी याद का क्या
यहाँ हालात कैसे है , कैसे कहे तुमसे , चलो ठीक है फिर तुम्हारी याद का क्या । ...
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रे बंदे छोड़ कपट- जीवन का हिसाब होगा
रे बंदे छोड़ कपट- जीवन का हिसाब होगा, इंसान क्या- इंसानियत जहां ईमान होगा, अनमोल- तेरा जीवन-ए-सफ़र का मंज़िल होगा, मुसाफ़िर-ए- धरा �
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कलम की धार
कलम की धार वो कैसी कलम की धार जिसमें असर न हो ? वो कैसी कलम की धार जो झूठ को डिगा न सके ? वो कैसी कलम की धार जिसमें सत्य प्रकाश न
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"परिंदा"
"परिंदा" "चंद दिनों की मोहलत लेकर आये थे,घर के आँगन में खुशियाँ बटौरने मौहलतें खत्म हुई,अब परिंदों का वापिसी का वक्त है" #Mukesh Namdev
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कोई लटक गया होगा पंखे से
कितनों के जीवन में अंधेरे हुए होंगे, शायद फिर ना कभी सवेरे हुए होंगे। कोई लटक गया होगा पंखे से , जब आंखों के सामने किसी के फेरे हुए हो�
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रूठ कर मुझसे बो मनाने आई है।
रूठ कर मुझसे बो मनाने आई है, ये उसकी साजिश है रुलाने आई है। पिछले जख्म भरे नहीं अभी तक, नए जख्मों पर नमक लगाने आई है।। Written by Mithun Anuragi
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अन्नदाता दुर्दशा
यह कहना कतई दोषपूर्ण नहीं है, कि संपूर्ण मानव जाति का ही नहीं बल्कि जानवरों आदि का पेट भरने वाले अन्नदाता का पेट स्वयं खाली है। यह कहा�
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दिल के जज्बात
समझ तो गई मेरे दिल के जज्बात पर बात हॉट तक ला के तू बोल पाती ना। प्यार पाने को मन तुम्हारा भी करता है पर बात दिल तक आके हॉट तक आ पाती ना�
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गौतम बुद्ध
बुद्ध बुद्ध कहती है ये दुनिया सारी 563 में लुम्बिनी ग्राम में खुशी हुई भारी तराई नेपान में क्षत्रिय शाक्य ने बनाई मिठाई पिता शुद्धोध�
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हौसला कमे न
हौसला कमे न हौसला कमे कभी भी न, रगों में तूफानों की बिजली हो। आँखों में हसरतों की हो बरसात, कामयाबी का अपना भी हो इतिहास। एक दिन हम भी
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हमारी दीवाली
*हमारी दीवाली* *कविता* ऐसे होती थी हमारी दीवाली घरों में चूना और छुई मिट्टी से पुताई होती थी घर के कपड़ों और पर्दों की धुलाई होती थ
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"तबाही"
"तबाही"......✍️ "अब क्या ही लिखों इन झुकी हुई निगाहों के बारे में,यदि उठ गई तो तबाही मुमकिन है" #Mukesh Namdev
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