मिलन...
जागकर रात विताऊं ,
या ...यूहीं लौट जाऊं,
कैसे कहूं ये चांदनी,
तुझे कैसे पास बुलाऊं.,
तुझसे मिलने को आतुर मैं,
खुद के साये से डर जाऊं read more >>
तुम्हारे हिस्से की वह हरी,पीली,
लाल, काली,चूड़ियों के वे टुकडे़
आज भी रखे है ...!
तुम्हारे लिए...
जिनके लिए तुम लड़जाया करती थीं,
अपने तेज read more >>
ढलती शाम...शीर्षक
कौतुहल से दूर ढलती संध्या ,
समेटती प्रकृती अपने करतलों को...!
घर जातीं गाय धूल उडा़ती ,
बछडो़ को पाने सुख रभांती ..!
आसम� read more >>