(दोहा छंद)
बेकाबू जब मन रहे,चले न कोई जोर।
देते रब को दोष तब,रखे भावना चोर।।
चले न कोई जोर तब,मन की जब हो बात।
पहले ही हम भाँप कर,कर लेते ख read more >>
(रोला छंद)
चले न कोई जोर, करे मन हरदम अपना।
फिर भी अपनी सोच, पूर्ण करना है सपना।।
रखता सदा विवेक,तभी रहता मन काबू।
चलता अपनी राह, कहे मुझक read more >>
( मुक्तक छंद )
जीवन के अब यार क्यों, बिगड़ गए सुर ताल।
आओ कुछ मंथन करें,करिए खत्म बवाल।
महँगाई की मार से,कमर गई है टूट_
खोए अपने में सभी,बढ� read more >>
इश्क की गलियों से होता हुआ
कितनी रसाकसी के बाद आज
पहुंचा हूं मुकाम पे....!
बहुत कुछ मिलने की उम्मीद में
सब कुछ गवा वैठा हूं...!
राह बदर रा� read more >>
अक्सर मैं दु:खी हो जाती हूँ ,
जब किसी दूसरी औरत को,
देखकर तुम्हारी आंखें विस्तृत,
हो जाया करतीं हैं तब....!
या फिर मेरी पीठ पर गढ़तीं हैं ,
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ना कुछ देना था अपने हाथों में।
ना कुछ लेना था अपने हाथों में।
वो सब उस खुदा के हाथ है।
वो कब लेता है कब देता है।
ये सब उस खुदा read more >>