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समय समय का फेर है-चाहत रखे जवान
समय समय का फेर है, सुख दुख का है मेल। करते हम सब सामना,पाते सदा उलेल।। समय समय का फेर है,जीवन कर्म प्रधान। कर्म राह पर चल सदा,सुरभित होग�
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कलियुग के इंसान को साधन सुविधा खास
कलियुग के इंसान को,साधन सुविधा खास। इतरा रहे विकास में,खुशियाँ सबके पास।। कलियुग के इंसान में,समझ बूझ है खूब। जीवन स्तर शुभ हुआ,दिखत�
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अनुचित चिंतन त्याग दें-उत्तम होगा चेत
अनुचित चिन्तन त्याग दें,उत्तम होगा चेत। सूर्य उत्तरायण हुए,अति शुभ है संकेत।। अति शुभ है संकेत,हर्ष मय होगा भारत। होगा कभी न अन्त,बन्
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सुख से रखें लगाव
सूर्य उत्तरायण हुए,अद्भुत पड़े प्रभाव। दुष्ट भाव अब दूर हो,होगा मीठा चाव। हर दिन अच्छा सोचकर,करें सृजन कुछ खास_ अनुचित चिन्तन त्याग द
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जिसकी जैसी भावना चलें रचें इतिहास
जिसकी जैसी भावना,चलें रचें इतिहास। एक नया ही पाठ बन,सबको लगिए खास।। सबको लगिए खास,रखें संगत अति सुन्दर। वैसा होगा नाम,मिले सुख दिल के �
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जिसकी जैसी भावना दे निराश को आस
जिसकी जैसी भावना,दे निराश को आस। दग्ध हृदय को दे सके,एक सुखद अहसास।। जिसकी जैसी भावना,वैसा रहे प्रभाव। नूतन उम्दा काम कर,कुछ तो हो बद�
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जिसकी जैसी भावना वैसा उसका काम
जिसकी जैसी भावना, वैसा उसका काम। कर्म पक्ष ही फल मिले,वैसा होगा नाम। स्वच्छ रखें जब सोच को,चलें रचें इतिहास_ एक नया ही पाठ बन,करें जगत ग�
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कहो धरती पे इसे लाते हैं
हंस हंस कर लोग जलाते हैं, धूप में रोशनी दिखाते हैं। आकाश अपना, उसका रंग अपना, कहो धरती पे इसे लाते हैं। सुधा चौधरी बस्ती
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प्यार छुपा के रखा-दुनिया से छुपा के रखा
प्यार छुपा रखा- तुझे कैसे समझाऊं, दुनिया से छुपा के रखा.. यह चिराग़ से रौशन होगी,, रौशनी के लिए- दर्द-ए-सितम से गुज़र जाऊंगा..!! -मोती
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फ़िक्र कल में बसा संसार
गुज़रे कल- को रोते तमाम, फ़िक्र कल में बसा संसार सो बिरला जान- जो पूर्णत: आज में जीता उसके- दो दिन परमानंद में कटते -मोती
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भूख निगले जा रहा है
भूख निगले जा रहा है! आंखों से दृष्टि गई- जुबान से आवाज भी गई सब मिट गए रिश्ते-नाते,, अब मज़हब- देश-दुनिया तक याद नहीं भूख निगले जा रहा �
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बखरी की कोठरी के ताखा में जलती ढेबरी
यादों के पिटारे से यदि आपने : बखरी की कोठरी के ताखा में जलती ढेबरी देखी है। दलान को समझा है। ओसारा जानते हैं। गाँव के किनारे पर कचहरी
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