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एक मूरख नारी को कब,ना जाने किसने। लपेटा था। ज्ञात हुआ तब लोगों को, जब जना नारी ने बेटा था। कहने को वह मूरख थी, पर पुत्र प्रेम की क्षमता थी read more >>
"जगावे न जगने जगून जगा वेगळे, इथे न कोणी आपला आपले आपून एकटे." read more >>
मैं अभी पुल पार कर ही रही थी कि सचखंड ट्रेन स्टेशन पर आ गयी ,मैं और तेज तेज भागने लगी ,मेरी साँस बुरी तरह फूलने लगी | मेरे भाई ने टोका “जल� read more >>
पीढ़ियों से जहां एक पेड़ पीपल का था वो कहाँ गया? पतझड़ में, जिसकी छाँव बड़ी शीतल, थी और जिसके नीचे बिना धर्म की बैठक थी! ओ हो ! हमने उस� read more >>
जंगल पर राज करने वाले लोग जंगल से खदेड़ दिये तुमने सिर्फ इज्जतें ही नही लूटीं चमड़े तक उधेड़ दिये और इतने पर भी जुल्म तुम्हारे खत्म न� read more >>
एक मां के दो बेटे थे मां अपने बच्चों से बहुत प्रेम करती थी वह अपने बच्चों को पढ़ा लिखा कर डॉक्टर और आईपीएस बनाना चाहती थी वह मां अपने बच� read more >>
नारी, अब तेरी बारी। मन उमंग में, हक़ीक़त के रंग भरो। निगृहीत भाव, संतप्त मन, तारों को झंकृत करो। लोहे, चांदी व सोने की, सलाख़ें टटोलो। स� read more >>
ना नक्सली हैं ना माओवादी हैं वतन के चराग़ हैं हम वतन की बाती हैं हम आदिवासी हैं हम आदिवासी हैं मत कुचलो पहरेदार हमे हम लूटो पहरेदार ह� read more >>
//...चापलूसी...गुलामी...बेईमानी...// एक , बढ़िया कला... , सीधा , सरल , भला...! चापलूसी , गुलामी , बेईमानी... , चलाती कईयों जिंदगानी...! ये... चीज , बड़� read more >>
ग़मों को छुपाये रखना चेहरे पर मुस्कराहट सजाये रखना गम अगर जीवन में हो तब भी चेहरे को फुल की तरह खिलाये रखना जाहिर न होने देना अपने गम read more >>
न जाने वो दिन कब आयेगा, जो जीवन का वसंत ऋतु कहलायेगा । न जाने वो दिन कब आयेगा, जब कुछ आधे अधुरे खवाब पुरे हो जायेंगे। न जाने वो दिन कब आये read more >>
लघुकथाः स्नेह-चिकित्सा एक झोपड़ी में एक बुड्ढा और एक बुढ़िया रहते थे। वे निःसंतान थे। कूली-मजूरी कर अपना जीवन-यापन कर रहे थे। मजदूरी अध� read more >>
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