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अपनापन-जो छोड़ गये तुम को तुम क्यो उनको अपना कहते हो
आत्मीयता खोकर भी तुम अपना कहते हो । जो छोड़ गये तुम को तुम क्यो उनको अपना कहते हो । जिन्हें प्रेम नहीं ह�
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बाँट-जो एक जीवन भर अन्त समय में में बाँटा
पले बढ़े जिनके आगे जिनकी गोदी मे खेले क्या वस्तु है वे कोई जो उनको बाँटा जाता है। खण्ड - खण्ड हो जाता उर , जब द�
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पूर्ण सत्य के पथ पर-जुर्म के खिलाफ उठ जाते है कई शख्श
जब भी बोलता हूँ मैं जुर्म के खिलाफ , उठ जाते है कई शख्श मेरे खिलाफ । देख रहे है जन अधरो पर हाथ धरे , मौन सभी बैठे है हाथो पर हाथ धरे
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घड़ी की फितरत
घड़ी की फितरत ही अजीब है हमेशा टिक टिक करती हैं मगर ना खुद टिकती हैं और ना दूसरे को टिकने देती हैं ।।
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झूठ-झूठी दुनिया झूठे लोगो को छोड़ा हो जाओ तुम भी सत्यनिष्ठ
मुझसे बच सका न कोई क्या मुझसा नहीं कोई चाहे जो कहते हो खुद को सतनिष्ठ पर बोले है कभी कही पर झूठ बुलताती ह
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विचार -उद्भ्रमण आरोहावरोह मन में
उग्र, उद्विग्न भाव, आरोहावरोह मन में। कस्तूरी मृग ज्यूं, भटके कानन में। संयुग्मन, पुनरागमन, वासर, स्वप्न में। वामन से दानव, दानव से व�
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मरता क्या नहीं करता-जिन्दगी है यह इसके रूप अनेक
मरता क्या नहीं है करता, जिन्दगी है यह इसके रूप अनेक। किसी पर कब हो जाए मेहरबान, किसी पर कब हो जाए नाराज। जीवन भर लेती रहती कठि
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परिवर्तन संसार का-सुनो नियम है पार्थ
दोहा छंद परिवर्तन संसार का, सुनो नियम है पार्थ। खाली हाथ आए यहां, जाना खाली हाथ।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह ✍️ जिला;'समस्तीपुर(
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सुख दुख हैं मेहमान जी- स्वागत करना काम
दोहा छंद सुख दुख हैं मेहमान जी,स्वागत करना काम। दो ही पहलू सत्य है,कभी सुबह तो शाम।। सुख दुख हैं मेहमान जी, सही सिखाते मर्म। सुख में भ�
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जलने लगे अलाव अब ठंढ़ी चारों और-थड़थड़ हैं तन कांपते
दोहा छंद जलने लगे अलाव अब,ठंढ़ी चारों और। थड़थड़ हैं तन कांपते, नहीं बंधते कौर।। जलने लगे अलाव अब,अमृत तुल्य है आग। बिना आग के जल नही�
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दूर रहे भ्रम तब सदा-पालें नहीं तनाव
दोहा छंद दूर रहे भ्रम तब सदा,पालें नहीं तनाव। जीवन शैली स्वस्थ हो,गहरा शयन बचाव।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्तीपु�
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मेरे अपने लोग सब काफी हैं मजबूत- मेरे आते काम में दौलत जिसे अकूत
मुक्तक छंद मेरे अपने लोग सब, काफी हैं मजबूत। मेरे आते काम में, दौलत जिसे अकूत। इसका मुझे गुमान है,मन भी है गुलजार- आस रखा हूं और
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