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नाराऐ हिन्द
हिन्द लीख रहा कर्म शुद्धा का, संघर्षों कि कथा को मान दिया! अमर पवन, जलधार, तरू - तट, धरा को पावन धाम किया!! कभी मिली अमर रस महा हिन्
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कर रही ध्वस्त
कर रही ध्वस्त मानवता को, मानव वंदीत ये कर्मियता! है वयस्त प्रभाकर उदित बने, अंधियारों की है आत्मियता!! थे बुद्ध जहां बुद्धी मे
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मौत
आहिस्ता आहिस्ता जिंदगी बीत रही थी, मन चंचलता में खेल रहा था। उम्र ने भी क्या खेल खेला जवानी की लालसा दिखाकर, बचपन को भी छीन रहा था। जीव�
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जिंदगी एक उलझी किताब हैं
जिंदगी एक उलझी किताब हैं, इसको समझना ना आसान हैं, पूरे पन्ने पढ़कर भी कुछ शब्द छूट जाते हैं,पूरी किताब समझ नहीं पाते हैं।
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प्यार की दास्तां
उसने छोड़ा जो मुझको, शायद मेरा ही कसूर था .. उसने अच्छा किया या बुरा, वो फैसला मुझे मंजूर था । मुझसे भिन्न अब उसकी राहें होंगी , ये सोचकर
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अपना कहने वालों को पराया होते देखा
अपना कहने वालों को पराया होते देखा,जो कहते थे संभाल लेंगे, उन्हें दूर खड़ा देखा, सबको अपनों की चिंता हैं, सबको अपने काम में व्यस्त देखा
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देर है अंधेर नहीं
किसी के साथ गलत कर के अपनी बारी का इंतजार करना क्योंकि ऊपर वाले के यंहा देर है अंधेर नहीं
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टूटे दिल की आवाज़
उसकी खुशी से जलन होती है हमें मगर मैं ये भी नहीं चाहता की वो दुखी हो
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बूढ़ी औरत-बेला की मार बुरी औरत कितनी बूढ़ी
बूढ़ी औरत - बेला की मार बुरी ; औरत कितनी बूढ़ी , करती दिवा में मजदूरी - गिट्टी बिछाती रेल पट्टी में - कर्म - भू बुटीबोरी ; कौन छीना रोटी - भात ,
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जीवन
जीवन मे सुख और दुख का एक ही आकार है फर्क बस इतना है कि सुख के आकार को हम भरते नहीं और दुख के आकार को गिन गिन के भरते हैं लेखिका प्रेरणा शर्
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आँखे
आँखों मे आँसुओं का आना भी अजीब हैं ख़ुशी के आंसू सब को दिख जाते हैं लेकिन दुःख के आंसू नज़र आकर भी किसी को नज़र नहीं आते लेखिका प्रेरणा श
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जिंदगी के सफर में गमों के मेले हैं
जिंदगी के सफर में गमों के मेलें हैं, कहीं कांटे , अंगारों के ढेले हैं, गहरी खाई, अंधेरों कुएं के साये हैं।
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