SEWANAND 15 Aug 2023 आलेख समाजिक हम बदलेंगे, युग बदलेगा 43015 0 Hindi :: हिंदी
हम बदलेंगे युग बदलेगा जैसा हम औरों को बनाना- बदलना चाहते हैं, वैसा ही स्वयं को बनना - बदलना होगा। दूसरों को बदलने के लिए स्वयं में बदलाव जरूरी है। अपने में आने वाले बदलाव से आस-पास के लोग, वातावरण अपने आप ही बदलने लगते हैं। बिना स्वयं में परिवर्तन लाए औरों में परिवर्तन संभव नहीं । जो स्वयं जाग्रत है केवल वही, दूसरों के जागरण में सहायक बन सकता है। स्वयं सोया हुआ भला औरों को किस तरह से जगा पायेगा ? सच भी यही है कि जिसके भीतर स्वयं ही अंधकार का आवास है, वह कभी भी दूसरों के लिए प्रकाश का स्त्रोत नहीं हो सकता। दूसरों की सेवा केवल तभी संभव है, जब हम स्वयं का सृजन प्रारम्भ करें। लोकनिर्माण, आत्मनिर्माण के बिना असंभव है। किसी ने संत तिरुवल्लुवर से पूछा "मैं सेवा करना चाहता हूँ।" वह . मुस्कुराकर बोले "पहले साधना तब सेवा" क्योंकि जो तुम्हारे पास नहीं है, उसे तुम दूसरो को कैसे दोगे ? साधना से जब पाया जा चुका हो, तभी उसे सेवा में बाँटा जा सकता है। हालांकि उलट वासी यही है कि सेवा की चाहत बहुतों में होती है, पर स्व-साधना और आत्म सृजन की नहीं। यह तो वैसा ही हुआ जैसे कोई बीज तो बोना ना चाहे, लेकिन फसल काटना चाहे । किसी अत्यन्त दीन-दुर्बल दरिद्र व्यक्ति ने भगवान महावीर से कहा "भगवन् ! मैं मानवता की सेवा कैसे करूँ ?" वह व्यक्ति शरीर से नहीं, आत्मा से दुर्बल था। वह दरिद्र धन से नहीं, जीवन से था। भगवान महावीर ने उसे बड़े ही करूण भाव से देखा और बड़े दयाभाव से उससे बोले “क्या कर सकोगे तुम ?" यह वचन हममें से हर एक को कहा गया है। सब करना स्वयं | पर और स्वयं से प्रारम्भ होता है। अपने परिवर्तन में ही युग परिवर्तन का बीज निहित है। तभी तो युगऋषि की वाणी कहती है "हम बदलेंगे युग बदलेगा।" लेखक :- सेवानंद चौहान राज्य पुरस्कार प्राप्त शिक्षक